आजादी की लड़ाई में औरतों ने भी खूब दीं कुर्बानियाँ

आजादी के आंदोलन में हिंदुस्तान की महिलाओं का अविस्मरणीय योगदान रहा है। तमाम वीर स्त्रियों ने पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर स्वतंत्रता संग्राम का जयघोष किया। उन स्वातंत्र्य योद्धा महिलाओं में आज कस्तूरबा गांधी, विजयलक्ष्‍मी पंडित, अरुणा आसफ अली, सिस्‍टर निवेदिता, मीरा बेन, कमला नेहरू, मैडम भीकाजी कामा, सरोजिनी नायडू, सुचेता कृपलानी, रानी लक्ष्मीबाई, बेगम हज़रत महल, ऐनी बेसेंट, कश्मीर की प्रसिद्ध कवयित्री ललद्दद, भगतसिंह को सुरक्षा देने वाली दुर्गा भाभी, रायगढ़ की रानी अवंतीबाई, कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान को याद कर हमारा देश हमेशा गौरवान्वित होता है।

वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई खुद को बहादुर मानने वाली देशभक्त महिलाओं की आज भी प्रेरणा हैं। देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857) में उन्होंने अपने पराक्रम से अंग्रेजों को नाको चने जबवा दिए थे। अपनी वीरता के किस्सों को लेकर वह किंवदंती बन गईं।  लखनऊ में जंगे-आज़ादी के दौरान नज़रबंद बागी बेगम हज़रत महल ने वाजिद अली शाह को छुड़ाने के लिए लार्ड कैनिंग के सुरक्षा दस्ते में भी सेंध लगा दी थी। ऐसी ही एक वीरांगना ऊदा देवी थीं, जिनके पति चिनहट की लड़ाई में वीरगति को प्राप्त हुए। ऐसा माना जाता है कि डब्ल्यू गार्डन अलक्जेंडर एवं तत्पश्चात क्रिस्टोफर हिबर्ट ने अपनी पुस्तक ‘द ग्रेट म्यूटिनी’ में लखनऊ में सिकन्दरबाग किले पर हमले के दौरान जिस वीरांगना के अदम्य साहस का वर्णन किया है, वह ऊदा देवी ही थीं। ऊदा देवी ने पीपल के घने पेड़ पर छिपकर लगभग 32 अंग्रेज सैनिकों को मार गिराया। अंग्रेज असमंजस में पड़ गये और जब हलचल होने पर कैप्टन वेल्स ने पेड़ पर गोली चलाई तो ऊपर से एक मानवाकृति गिरी। नीचे गिरने से उसकी लाल जैकेट का ऊपरी हिस्सा खुल गया, जिससे पता चला कि वह महिला है। उस महिला का साहस देख कैप्टन वेल्स की आंखें नम हो गईं, तब उसने कहा कि यदि मुझे पता होता कि यह महिला है तो मैं कभी गोली नहीं चलाता। ऊदा देवी का जिक्र अमृतलाल नागर ने अपनी कृति ‘गदर के फूल’ में बकायदा किया है। इसी तरह की एक वीरांगना आशा देवी थीं, जिन्होंने 8 मई 1857 को अंग्रेजी सेना का सामना करते हुए शहादत पाई। आशा देवी का साथ देने वाली
वीरांगनाओं में रनवीरी वाल्मीकि, शोभा देवी, वाल्मीकि महावीरी देवी, सहेजा वाल्मीकि, नामकौर, राजकौर, हबीबा गुर्जरी देवी, भगवानी देवी, भगवती देवी, इंदर कौर, कुशल देवी और रहीमी गुर्जरी इत्यादि शामिल थीं। ये वीरांगनाएं अंग्रेजी सेना के साथ लड़ते हुए शहीद हो गईं।

बेगम हजरत महल के बाद अवध के मुक्ति संग्राम में जिस दूसरी वीरांगना ने प्रमुखता से भाग लिया, वे थीं गोंडा से 40 किलोमीटर दूर तुलसीपुर रियासत की रानी राजेश्वरी देवी। राजेश्वरी देवी ने होपग्रांट के सैनिक दस्तों से जमकर मुकाबला लिया। अवध की बेगम आलिया ने भी अपने अद्भुत कारनामों से अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी। बेगम आलिया 1857 के एक वर्ष पूर्व से ही अपनी सेना में शामिल महिलाओं को शस्त्रकला में प्रशिक्षण देकर सम्भावित क्रांति की योजनाओं को मूर्त रूप देने में संलग्न हो गई थीं। अपने महिला गुप्तचर के गुप्त भेदों के माध्यम से बेगम आलिया ने समय-समय पर ब्रिटिश सैनिकों से युद्ध किया और कई बार अवध से उन्हें भगाया। इसी प्रकार अवध के सलोन जिले में सिमरपहा के तालुकदार वसंत सिंह बैस की पत्नी और बाराबंकी के मिर्जापुर रियासत की रानी तलमुंद कोइर भी इस संग्राम में सक्रिय रहीं। अवध के सलोन जिले में भदरी की तालुकदार ठकुराइन सन्नाथ कोइर ने विद्रोही नाजिम फजल अजीम को अपने कुछ सैनिक और तोपें, तो मनियारपुर की सोगरा बीबी ने अपने 400 सैनिक और दो तोपें सुल्तानपुर के नाजिम और प्रमुख विद्रोही नेता मेंहदी हसन को दी। इन सभी ने बिना इस बात की परवाह किए हुए कि उनके इस सहयोग का अंजाम क्या होगा, क्रांतिकारियों को पूरी सहायता दी।

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने महिलाओं की एक अलग टुकड़ी ‘दुर्गा दल’ बनायी हुई थी। इसका नेतृत्व कुश्ती, घुड़सवारी और धनुर्विद्या में माहिर झलकारीबाई के हाथों में था। झलकारीबाई ने कसम उठायी थी कि जब तक झांसी स्वतंत्र नहीं होगी, न ही मैं श्रृंगार करूंगी और न ही सिन्दूर लगाऊंगी। अंग्रेजों ने जब झांसी का किला घेरा तो झलकारीबाई जोशो-खरोश के साथ लड़ी। चूंकि उसका चेहरा और कद-काठी रानी लक्ष्मीबाई से काफी मिलता-जुलता था, सो जब उसने रानी लक्ष्मीबाई को घिरते देखा तो उन्हें महल से बाहर निकल जाने को कहा और स्वयं घायल सिहंनी की तरह अंग्रेजों पर टूट पड़ी और शहीद हो गयीं। झलकारीबाई का जिक्र मराठी पुरोहित विष्णुराव गोडसे की कृति ‘माझा प्रवास’ में भी मिलता है। रानी लक्ष्मीबाई की सेना में जनाना फौजी इंचार्ज मोतीबाई और रानी के साथ चौबीस घंटे छाया की तरह रहने वाली सुन्दर-मुन्दर और काशीबाई सहित जूही और दुर्गाबाई भी दुर्गा दल की ही सैनिक थीं। इन सभी ने अपने जान की बाजी लगाकर रानी लक्ष्मीबाई पर आंच नहीं आने दी और अन्तोगत्वा वीरगति को प्राप्त हुईं।
कानपुर 1857 की क्रांति का प्रमुख गवाह रहा है। पेशे से तवायफ अजीजनबाई ने यहां क्रांतिकारियों की संगत में 1857 की क्रांति में लौ जलायी। एक जून 1857 को जब कानपुर में नाना साहब के नेतृत्व में तात्याटोपे, अजीमुल्ला खान, बालासाहब, सूबेदार टीका सिंह और शमसुद्दीन खान क्रांति की योजना बना रहे थे तो उनके साथ उस बैठक में अजीजनबाई भी थीं। इन क्रांतिकारियों की प्रेरणा से अजीजन ने मस्तानी टोली के नाम से 400 महिलाओं की एक टोली बनायी जो मर्दाना भेष में रहती थीं। एक तरफ ये अंग्रेजों से अपने हुस्न के दम पर राज उगलवातीं, वहीं नौजवानों को क्रांति में भाग लेने के लिये प्रेरित करतीं। सतीचौरा घाट से बचकर बीबीघर में रखी गईं 125 अंग्रेज महिलाओं और बच्चों की रखवाली का कार्य अजीजनबाई की टोली के ही जिम्मे था। बिठूर के युद्ध में पराजित होने पर नाना साहब और तात्याटोपे तो पलायन कर गये लेकिन अजीजन पकड़ी गयी। युद्धबंदी के रूप में उसे जनरल हैवलॉक के समक्ष पेश किया गया। जनरल हैवलॉक उसके सौन्दर्य पर रीझे हुए बिना न रह सका और प्रस्ताव रखा कि यदि वह अपनी गलतियों को स्वीकार कर क्षमा मांग ले तो उसे माफ कर दिया जायेगा। किंतु अजीजन ने एक वीरांगना की भांति उसका प्रस्ताव ठुकरा दिया और पलट कर कहा कि माफी तो अंग्रेजों को मांगनी चाहिए, जिन्होंने इतने जुल्म ढाये। इतने पर आग बबूला हो हैवलॉक ने अजीजन को गोली मारने के आदेश दे दिये। क्षण भर में ही अजीजन का अंग-प्रत्यंग धरती मां की गोद में सो गया।कानपुर के स्वाधीनता संग्राम में मस्तानीबाई की भूमिका भी कम नहीं है। बाजीराव पेशवा के लश्कर के साथ ही मस्तानीबाई बिठूर आई थी। अप्रतिम सौन्दर्य की मलिका मस्तानीबाई अंग्रेजों का मनोरंजन करने के बहाने उनसे खुफिया जानकारी हासिल कर पेशवा को देती थी। नाना साहब की मुंहबोली बेटी मैनावती भी देशभक्ति से भरपूर थी। नाना साहब बिठूर से पलायन कर गये तो मैनावती यहीं रह गयी। जब अंग्रेज नाना साहब का पता पूछने पहुंचे तो मौके पर 17 वर्षीया मैनावती ही मिली। नाना साहब का पता न बताने पर अंग्रेजों ने मैनावती को जिन्दा ही आग में झोंक दिया|

इतिहास के पन्नों में न जाने ऐसी कितनी दास्तान हैं, जहां वीरांगनाओं ने अपने साहस और जीवटता के दम पर अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए। मध्यप्रदेश में रामगढ़ की रानी अवन्तीबाई ने 1857 के संग्राम के दौरान अंग्रेजों का प्रतिकार किया और घिर जाने पर आत्मसमर्पण करने की बजाय स्वयं को खत्म कर लिया। मध्य प्रदेश में ही जैतपुर की रानी ने अपनी रियासत की स्वतंत्रता की घोषणा कर दतिया के क्रांतिकारियों को लेकर अंग्रेजी सेना से मोर्चा लिया। तेजपुर की रानी भी इस संग्राम में जैतपुर की रानी की सहयोगी बनकर लड़ीं। मुजफ्फरनगर के मुंडभर की महावीरी देवी ने 1857 के संग्राम में 22 महिलाओं के साथ मिलकर अंग्रेजों पर हमला किया। अनूप शहर की चौहान रानी ने घोड़े पर सवार होकर हाथों में तलवार लिए अंग्रेजों से युद्ध किया और अनूप शहर के थाने पर लगे यूनियन जैक को उतार कर हरा राष्ट्रीय झंडा फहरा दिया। इतिहास गवाह है कि 1857 की क्रांति के दौरान दिल्ली के आस-पास के गावों की लगभग 255 महिलाओं को मुजफ्फरनगर में गोली से उड़ा दिया गया था। 1857 की गदर में भारतीय महिलाओं में गजब की देश की भक्ति देखने को मिली। कई मौकों पर आजादी की लड़ाई में पुरुषों से आगे निकल गई महिलाएं।

बंगाल की प्रीतिलता वादेदर, कमला दास, मातांगिनी हाजरा, आजाद हिन्द फौज की कैप्टन लक्ष्मी सहगल समेत ऐसे कई नाम हैं जो हाशिये पर ही रह गये। सच तो ये है कि सन् 1857 के स्वतंत्रता आंदोलन से पहले ही कश्मीर की प्रसिद्ध कवयित्री ललद्दद स्वतंत्रता के गीत गाने लगी थीं। आजादी की लड़ाई में कस्‍तूरबा गांधी ने न सिर्फ हर कदम पर अपने पति महात्मा गांधी का साथ दिया था, बल्कि वह कई बार गाँधीजी के मना करने के बावजूद जेल गईं। सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लेने के कारण जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्‍मी पंडित को जेल में कैद कर दिया गया था। बाद में वह भारत के इतिहास में देश की पहली महिला मंत्री, संयुक्‍त राष्‍ट्र की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष, पहली महिला राजदूत बनीं। हरियाणा के एक रूढ़िवादी बंगाली परिवार में जनमीं अरुणा आसिफ अली को अँग्रेजों की हुकूमत ने बार-बार गिरफ्तार कर जेल भेजा। ऐतिहासिक भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 9 अगस्‍त, 1942 को उन्होंने मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान में राष्‍ट्रीय झंडा फहराकर आंदोलन की अगुवाई की।

विदेशी मूल की मारग्रेट नोबल, जिन्हें लोग सिस्‍टर निवेदिता के नाम से याद करते हैं, स्वामी विवेकानंद से प्रभावित होकर आजादी के आंदोलन में कूद पड़ी थीं। थियोसोफिकल सोसाइटी और भारतीय होम रूल आंदोलन में अपनी विशिष्ट भागीदारी निभाने वाली ऐनी बेसेंट भी विदेशी मूल की स्त्री स्वातंत्र्य योद्धा थीं। उन्होंने भारत में महिला अधिकारों की भी लड़ाई लड़ी। इसी तरह लंदन के एक सैन्‍य अधिकारी की बेटी मैडलिन स्‍लेड, जिन्हे बाद में मीरा बेन कहा जाने लगा था, महात्मा गाँधी से अनुप्राणित होकर हिंदुस्तान आईं और यहीं की होकर रह गईं। पंडित जवाहर लाल नेहरू की धर्मपत्नी कमला नेहरू लौह स्‍त्री की तरह स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में हुकूमत विरोधी धरना-जुलूसों में अँग्रेजों का सामना करती रहीं। जब टीबी से पीड़ित होकर स्विटजरलैंड के अस्पताल में दम तोड़ रही थीं, उस समय नेहरू जी जेल में थे।

कांग्रेस रेडियो जिसे ‘सीक्रेट कांग्रेस रेडियो’ के नाम से भी जाना जाता है, की शुरुआत करने वाली सावित्रीबाई फूले (ऊषा मेहता) को 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान पुणे की येरवाड़ा जेल में रहना पड़ा। इंदिरा गांधी ने भी जब अंग्रेजों के विरुद्ध लोहा लेना चाहा तो उनकी टोली को वानर सेना का नाम दिया गया जो विदेशी कपड़ों की होली जलाने में सहयोग करती थी।

इसी कड़ी में रानी झलकारी बाई और शहीदे आजम भगत सिंह को सुरक्षा देने वाली दुर्गा भाभी का नाम भी लिया जाता है। रायगढ़ की रानी अवंतीबाई ने अंग्रजों के विरुद्ध संघर्ष का ऐलान कर मंडला के खेटी गांव में मोर्चा जमा लिया। अंग्रेज सेनापति वार्टर के घोड़े के दो टुकड़े कर दिए तो वह रानी के पैरों पर गिरकर प्राणों की भीख मांगने लगा था। हमेशा मिलिट्री यूनीफॉर्म में हाथ में तलवार लिए अजीजन बाई युवतियों की टोली के साथ घोड़ों पर सवार होकर नौजवानों को आजादी की लंड़ाई में शामिल होने का आह्वान करती रहीं। वह घायल सैनिकों का इलाज भी करती थीं। जब कर्नल विलियम ने कानपुर क्रांतिकारियों की सूची बनाई तो उसमें सबसे ऊपर अजीजन का ही नाम था। नाना साहब की पुत्री मैनादेवी के त्याग को भी भला कौन विस्मृत कर सकता है। जब अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया तो क्रांतिकारियों के बारे में जानकारी न देने पर उन्हें जिंदा जला दिया गया।

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