आधुनिक हिन्दी भाषा और साहित्य के प्रणेता थे आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी

राजेन्द्र परदेसी

हिन्दी के गद्य एवं पद्य दोनों को ही नया स्वरुप, नयी ऊर्जा और नये आस्वाद से सुसम्पन्न करने वाले युगावतार आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे साहित्य साधक ने जो अनन्यतम साहित्यिक अवदान किया है वह हिन्दी के साहित्येतिहास में स्वर्ण अध्याय के रूप में व्यक्त हुआ है। इसकी आभा कभी भी मंद नहीं होगी और हिन्दी के सृजेताओं का युगों-युगों तक मार्ग दर्शन करती रहेगी। आचार्य द्विवेदी जैसे युग प्रवर्तक साहित्य सेवी एवं सम्पादक युगों बाद जन्मते हैं।

भारतेन्दु युग के बाद सन् १९०० के आसपास साहित्यिक सुधारों के कारण द्विवेदी युग का आरम्भ हुआ जो साहित्य के क्षेत्र में खडी बोली को काव्योपयुक्त भाषा के रूप में मान्यता प्रदान किया साथ ही द्विवेदी युग की मान्यता प्रदान किया। साथ ही भारतेन्दु युग की भाषायी कमियों को सुधारते हुए उसे व्याकरण सम्मत बनाने का प्रयास किया गया। जन की रूचि एवं आकांक्षाओं के अनुरूप साहित्य को अनुशासित ढांचे में ढालने के उद्देश्य से समकालीन रचनाकारों के दिशा निर्देशक आचार्य के रूप मे पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी का साहित्य जगत में आगमन हुआ, जिन्होंने साहित्य के भाशा को संस्कारबद्ध बनाने के संल्प को पूरा करने में अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया और इन्हीं के नाम पर साहित्य का यह युग ‘द्विवेदी युग’ के नाम पुकारा जाने लगा।
आधुनिक काल के आरम्भिक दो उप विभाग हिन्दी जगत के लिए काफी महत्वपूर्ण रहे। भारतेन्दु युग रीतिकालीन परम्पराओं से साहित्य को अलग किया तो द्विवेदी युग भाषा और साहित्य में नया सुधार लाया और खडी बोली को साहित्य की भाषा का दर्जा दिया। ये उपलब्धियाँ दो साहित्यकारों की सक्रियता से ही संभव हो सकी। भारतेन्दु हरिशचन्द्र और पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी, वास्तव में ये व्यक्त नहीं एक युग थे। इसीलिए इन दो साहित्यकारों के नाम पर ही साहित्य युग का नामकरण किया गया।
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का जन्म १५ मई १८६४ को उत्तर प्रदेश के रायबरेली जनपद के दौलतपुर ग्राम में हुआ था। प्रारम्भिक शिक्षा गांव के पाठशाला में ही हुई। उसके पश्चात अंग्रेजी पढने के लिए रायबरेली शहर के विद्यालय में प्रवेश लिया। यहाँ की पढाई करने के बाद पिता के पास मुम्बई चले गये। जहाँ पर संस्कृत, गुजराती, मराठी और अंग्रेजी का ज्ञान प्राप्त किया। पढाई समाप्त कर वह रेलवे में नौकरी करने लगे। किन्तु उच्चाधिकारियों से अनबन होने के कारण रेलवे की नौकरी छोडकर साहित्य सेवा में लग गये। सन् १९०३ में साहित्यिक पत्रिका के सम्पादक बने जहाँ सन १९२० तक बडी निष्ठा और लगन से हिन्दी भाषा और साहित्य के उत्थान में संलग* रहे। उन्होंने अपने रचनाकाल में दो महत्वपूर्ण कार्य किये। एक ओर सरस्वती के सम्पादक के रूप में भाषा के परिष्कार और स्वरूप निर्धारण का काम किया तो दूसरी ओर हिन्दी के लेखकों एवं कवियों की एक सशक्त पीढी तैयार किया। काव्य-मंजूषा, कविता-कलाप, सुमन, काव्यकुन्ज, अबला विलाप, गंगालहरी ऋतुतरंगिणी, कुमारसम्भव सार (काव्य) आलोचनांजलि, प्राचीन पंडित और कवि नाट्यशास्त्र, साहित्य संदर्भ, हिन्दी भाषा की उन्नति (निबंध) विनय-विनोद, भामिनी-विलाप (अनुवाद) इत्यादि इनकी प्रमुख
रचनाएं हैं।
आधुनिक हिन्दी साहित्य में नवीन भावनाओं और अवधारणाओं के अभ्युत्थान का श्रेय एक ओर भारतेन्दु को मिला तो उन नवीन भावनाओं के परिष्कार एवं शोधन का श्रेय आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को। गद्य यो या पद्य सब पर द्विवेदी जी ने अपना प्रभाव डाला। उनके प्रयासों से साहित्य जगत को उच्च कोटि के अनेक साहित्यकार मिले। उन्होंने अपनी लेखनी से पूरे युग के साहित्यकारों का नियमन किया। उनके सद्प्रयासों से खडी बोली हिन्दी न केवल अस्तित्व में आयी, अपितु उसका पर्याप्त सम्बर्द्धन भी हुआ, भावों के परिष्कार के साथ-साथ भाषा को व्याकरण सम्मन संस्कार मिला। भारतेन्दु युगीन साहित्यकारों की साहित्य सर्जना के मनमाने पन पर अंकुश लगा। आचार्य महावीर प्रसाद ने मनमाने पर पर अंकुश लगाया। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की ही देन है कि हिन्दी आज जगह बना
पायी है।
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी मूलतः निबंधकार थे। उन्होंने निबंधकला को पत्रकारिता से जोडकर उसके प्रसार में काफी महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने करीब ढाई सौ निबंध लिखा, बेंटेन को आदर्श मानकर उनके निबंधों का अनुवाद भी किया। उसके बहुसंख्यक निबंध परिचयात्मक और आलोचनात्मक टिप्पणियों के रूप में दिखायी देते हैं, वस्तुः उनके निबंधों कें आत्मव्यंजना कम मिलती है। आक्रोश और क्षोभ की स्थिति में कहीं-कहीं उन्होंने अनुचित कार्यों का जब विरोध किया है वहाँ व्यंग्य रूप में उनकी आन्तरिक भावना अवश्य उजागर हुई है। जिसमें न्यायनिष्ठ आत्मा की झलक मिलती है, म्युनिसिपैलिटी के कारनामें, निबंध में व्यंग्य शैली देखने योग्य है, आत्मनिवेदन, प्रभात, सुतापराधे, जनकस्य दण्ड आदि निबंधों में व्यक्तित्व-व्यंजना के तत्व देखे जा सकते हैं।
‘सरस्वती’ के माध्यम से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने परिचयात्मक आलोचना का सूत्रपात किया। समालोचना को वे पत्रकारिता से जोडकर ही देखते थे। इसमें भी उन्होंने कुछ आदर्श और सिद्धान्त निर्धारित किया। समालोचक के कर्त्तव्य पर टिप्पणी करते उन्होंने लिखा है – किसी पुस् क या प्रबंध में क्या लिखा गया है, किस ढंग से लिखा गया है, वह विषय उपयोगी है या नहीं, उससे किसी का मनोरंजन हो सकता है या नहीं, उससे किसी को भी लाभ पहुँच सकता है या नहीं। लेखक ने कोई नई बात लिखी है या नहीं यही विचारणीय विषय है। समालोचक को प्रधानतः इन्हीं बातों पर विचार करना चाहिए।
द्विवेदी जी ने विषय विवेचना के साथ-साथ भाषा संबंधी त्रुटियों की ओर भी विशेष ध्यान दिया। वे सिद्धान्तों से समझौता करना जानते ही नहीं थे। भाषा और साहितय में स्वयं अनुशासित थे और अन्य को भी अनुशासित देखना चाहते थे। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने उनके महत्व को स्वीकार करते हुए लिखा है – यदि द्विवेदी जी न उठ खडे होते तो जैसी अव्यवस्थित, व्याकरण विरुद्ध और ऊटपटांग भाषा चारों ओर दिखायी पडती थी, उसकी परम्वपरा जल्दी न रूकती निर्णयात्मक आलोचना की शुरूआत आचार्य द्विवेदी ने ही की। कालिदास की आलोचना नैषधचरितचर्चा और विक्रमांक देव चरित चर्चा जैसी आलोचनाएं लिखी। अपने काव्य सिद्धांत प्रतिपादक कुछ निबंधों में कई अंग्रेज लेखकों को भी आधार बनाया। इसका प्रभाव यह हुआ कि इस क्षेत्र में ऐसी पृष्ठ भूमि तैयार हुई, जिस पर आगे चलकर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल तथा बाबू श्याम सुंदर दास ने हिन्दी की वैज्ञानिक आलोचना की भव्य इमारत को
खडा किया और आलोचना एक स्वतंत्र विषय के रूप में स्वीकृत हुई।
गद्य साहित्य की अन्य विधाओं में भी आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का रचनात्मक व्यक्तित्व उजागर हुआ है भारतेन्दु हरिशचन्द्र की भाँति ही आचार्य द्विवेदी ने भी जीवनी साहित्य में रूचि दिखायी और समकालीन रचनाकारों का मार्गदर्शन किया। उनके द्वारा रचित जीवनियाँ, प्राचीन पंडित और कवि (१९१८) सुकवि संर्कीतन (१९२४),
चरित चर्चा (१९२९) आदि ग्रंथों में प्रकाशित है। पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से संस्मरण साहित्य भी आचार्य द्विवेदी के द्वारा अस्तित्व में आया। ‘सरस्वती’ में समय-समय पर रोचक संस्मरण प्रकाशित हुए। उन्होंने अनुमोदन का अंत (फरवरी १९०५), सभा की सभ्यता (अप्रेल १९०७), विज्ञानाचार्य बसु का विज्ञान मंदिर (जनवरी १९१८) की रचना करके संस्मरण साहित्य को समृद्ध किया।
शिक्षा के क्षेत्र में भी आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के रचनात्मक व्यक्तित्व का निखार हुआ है, उनके द्वारा शिक्षा पर आधारित शिक्षा (१९१६) एक महत्वपूर्ण गं*थ है। भाषा, व्याकरण और लिपि संबंधी विचार-विमर्श की शुरुआत भी इस युग में हुई। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी और बालमुकुन्द गुप्त जैसे साहित्यकारों ने इन विषयों पर विद्वतापूर्ण लेखों की रचना की है।
वस्तुतः महावीर प्रसाद द्विवेदी आलोचक, निबंधकार, अनुवादक तथा पत्र-सम्पादक थे, किन्तु काव्य-रचना में भी इनका कोशल दिखायी देता है। वैसे कविता के क्षेत्र में इनकी रूचि नहीं थी। गद्य लेखन में ही आचार्य द्विवेदी को विशेष सफलता मिली। कविता में तत्सम प्रधान समस्त भाषा तथा प्रचलित शब्दावली युक्त सरल भाषा का समिश्रण मिलता है दृष्टव्य है –
पृथ्वी-समुद्र सरित नर-नाग सृष्टि
मांगल्य-मूल-मय वारिद-वारि दृष्टि
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्पादन काल में ‘सरस्वती’ के माध्यम से साहित्य का सृजन, समाज-सुधार, स्वतंत्रता चरित्र निर्माण तथा व्यापक राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर किया गया, इसलिए द्विवेदी युग में कलात्मक निखार कम, किन्तु साहित्य का स्वर गंभीर और दायित्व बोध से अधिक अनुप्राणित रहा7 साहित्य को सभ्य और शिष्ट समाज में सही जगह मिली। भाषा और साहित्य को जो गौरव इस युग में प्राप्त हुआ उसका सारा श्रेय आचार्य द्विवेदी को ही है। प्रखर प्रतिभा के बल पर अपनी साहित्य साधना से हिन्दी भाषा और साहित्य को मौलिक स्वरूप प्रदान करने में उनकी भूमिका अवसिमरणीय है। एक युगान्तकारी व्यक्तित्व के रूप में उनकी छवि स्मरणीय ही नहीं अनुकरणीय भी है। २१ दिसम्बर १९३८ को हिन्दी का इतना बडा साहित्य सेवी देश दुनिया को अलविदा करकर पंचतत्व में विलीन हो गया।
(साभार – राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर)
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