एड्स : बंगाल के अस्पतालों में ही चतुर्थ श्रेणी कर्मी व नर्सों की उपेक्षा सह रहे हैं मरीज

दीपक राम

हर साल की तरह इस साल भी गत 1 दिसम्बर को सारी दुनिया में एड्स दिवस मनाया गया।  एड्स पीड़ितों के प्रति संवेदनशील वातावरण बनाने की तमाम कोशिशें जारी हैं। यह सही है कि आम आदमी को जागरुक बनाना बहुत जरूरी है मगर आप उन अस्पतालों को संवेदनशीलता का पाठ कैसे पढ़ाएंगे जहाँ एड्स पीड़ित मरीज मंदिर समझकर जाते हैं और इन मंदिरों में ही बीमार होने की सजा दी जा रही है। हालत यह है कि मरीजों को चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों और नर्सों से भी उपेक्षा का शिकार होना पड़ रहा है।

राज्य में एचआईवी संक्रमण पीड़ितों के लिए काम करने वाली संस्था ‘बंगाल नेटवर्क ऑफ पिपल लीविंग विद एचआईवी एड्स’ के अध्यक्ष (एचआईवी पॉजीटिव) अध्यक्ष किशोर कुमार साव का दावा है कि बाहरी लोगों के साथ-साथ एचआईवी पॉजीटिव मरीजों को अस्पतालों में भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। इनके साथ-साथ हजारों एचआईवी पॉजीटिव मरीजों को समस्याओं का सामना करना पड़ता है। किशोर साव ने बताया कि वह पिछले करीब 19 वर्षों से एचआईवी संक्रमण से पीड़ित हैं।

राज्य सरकार द्वारा इलाज के लिए कई सुविधाएँ मिल तो रही है लेकिन जो भेदभाव की प्रक्रिया है वह अभी भी जारी है। साव का दावा है कि जब भी वे राज्य के सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने पहुँचते हैं उन्हें सबसे अधिक वहाँ के ग्रुप डी कर्मचारियों और नर्सों के भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। उन्होंने दावा किया कि नियम के मुताबिक किसी भी अस्पताल में यदि एचआईवी पीड़ित मरीज पहुँचता है तो उसकी बीमारी की जानकारी किसी अन्य मरीज व अन्य को नहीं दी जा सकती है।

नर्सें अन्य मरीजों को दूर रहने की देती हैं सलाह
एचआईवी संक्रमण का नाम सुनते ही लोगों में एचआईवी संक्रमण पीड़ित मरीज के प्रति एक हीन भावना आ जाती है। इसी के प्रति लोगों को जागरूक करने की पहल विभिन्न सरकारी व गैर सरकारी संगठनों द्वारा की जाती है। लेकिन यहाँ तो दावे के मुताबिक लोगों को जागरूक करने के बजाय एचआईवी पीड़ित मरीजों से दूर रहने की सलाह दी जा रही है। किशोर साव का दावा है कि अस्पतालों की नर्सें एचआईवी पीड़ित मरीजों से अन्य मरीजों को दूर रहने की सलाह देती हैं।

एचआईवी मतलब एड्स नहीं होता है 
ज्यादातर लोग एचआईवी और एड्स को एक ही बीमारी मानते हैं, पर ऐसा होता नहीं है। ये दोनों बीमारियाँ अलग-अलग हैं। इनमें सम्बन्ध है पर इसका ये मतलब नहीं कि एचआईवी संक्रमित व्यक्ति को एड्स हो।
क्या है एचआईवी?
आमरी अस्पताल (ठाकुरिया) में क्रिटिकल केयर के संयुक्त सलाहकार चिकित्सक सोहम मजुमदार ने कहा कि एचआईवी का मतलब होता है ह्यूमन इम्यून डेफिसिएंसी वायरस किसी एचआईवी संग्रमित व्यक्ति के साथ असुरक्षित यौन सम्बन्ध बनाने पर फैलता है। यौन सम्बन्धों के अलावा ये शरीर से निकलने वाले फ्लूइड जैसे कि वजाइना से निकलने वाला फ्लूइड या सिमेन, लार या रक्त के सम्पर्क से भी हो सकता है। एचआईवी वायरस का टेस्ट करने पर जब रिपोर्ट पॉजिटिव आती है, तो उसे एचआईवी पॉजीटिव कहा जाता है।


एड्स क्या है?
चिकित्सक मजूमदार के मुताबिक एड्स यानी की एक्वायर्ड इम्यून डेफिसिएंसी सिंड्रोम। किसी एचआईवी पॉजिटिव व्यक्ति को एड्स होने में 10 साल तक का समय लग जाता है। इस स्टेज में व्यक्ति के शरीर की इम्यूनिटी यानी रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहद कम हो जाती है। उसे कई संक्रमण एक साथ होने का खतरा रहता है।


एड्स मरीजों को नहीं मिलतीं ये सुविधाएं 
‘बंगाल नेटवर्क ऑफ पिपल लीविंग वीद एचआईवी एड्स’ के अध्यक्ष किशोर कुमार साव का दावा है कि राज्य सरकार और केन्द्र सरकार से एड्स पीड़ित मरीजों को बहुत सी सुविधाएँ मिलती हैं लेकिन कुछ आवश्यक सुविधाएं इनको अब भी नहीं मिल पा रही हैं। उन्होंने दावा किया कि एड्स पीड़ित मरीजों को किसी रोग के ऑपरेशन के लिए काफी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। सामान्य लोगों के तरह हमारे लिए उचित व्यवस्था नहीं है।
बंगाल में हैं 1 लाख एड्स पीड़ित
‘बंगाल नेटवर्क ऑफ पिपल लीविंग वीद एचआईवी एड्स’ संस्था से 42 हजार एचआईवी पॉजीटिव मरीज जुड़े हुए हैं। किशोर शाव ने बताया कि सरकारी आँकड़ों के मुताबिक बंगाल में कुल करीब 1 लाख लोग एड्स से पीड़ित हैं जबकि भारत की कुल जनसंख्या में से करीब 25 लाख लोग एड्स के मरीज हैं।

(लेखक पत्रकार हैं और स्वास्थ्य सम्बन्धित विषयों पर लगातार लिखते हैं)

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