ए औरत

उमा झुनझुनवाला

ए औरत
सब कहते हैं
तू दुर्गा है
तू काली है
तू सरस्वती है
पार्वती और लक्ष्मी है तू
तब मान ले न
कि पूज्यनीय है तू
हर हाल में
सशरीर न सही
पत्थरों में ही सही
क्या फ़र्क पड़ता है
जो पैर छूते छूते
छू लेते हैं छाती
दबोच लेते हैं अंग अंग
लिंग-पूजन भी तो अनिवार्य है
जानती हो न
मूर्तियाँ कौन गढ़ता है
औरत का वजूद मर्द से ही है
फिर क्यों करना पड़े संघर्ष
सौंप दे ख़ुद को तू उसे सहर्ष
आदिकालीन है रीत
स्त्रियाँ बनाती आईं हैं भोजन
नाना प्रकार के स्वादों का
पुरुषों के लिए हर पहर
स्वाद पुरुषों के लिए ही बने हैं
युगों युगों पहले ही
लिख दिया गया था शास्त्रों में
डेढ़ बरस की हो शरारत
या हो सौ बरस की लाचारी
व्याकरण में स्त्रीलिंग ही कहलाएगी
लज्जित न हो तू
कि गर्भ में ही
कर दी जाती है हत्या
मगर कन्या-पूजन तो करते हैं न
घर की सुख समृद्धि के लिए
और सुनो
बलात्कार शरीर का होता है
मूर्ति का नहीं
दुर्गा, काली, सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती
इसीलिए सब पत्थरों में तराशी गईं
ए औरत
अपने दुखों को कठोर बना
और बन जा बुत
हमेशा के लिए तू
कि पत्थर प्रजनन नहीं करते
         *
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