कल सुन्दर बनाना है तो घर में हाथ बँटाना है….लेट्स शेयर द लोड

अपराजिता फीचर्स डेस्क
क्या आपने कभी सोचा है कि घरेलू उपकरणों के विज्ञापनों में लड़के जल्दी क्यों नहीं दिखते या फिर क्यों हमेशा औरतें या लड़कियाँ ही फिल्मों में कपड़े सुखाते या खाना पकाती दिखती हैं। बचपन से ही हम लड़कियों को जिस प्रकार सिखाया जाता रहा है कि काम सीख जाओ, पराए घर जाना है, वैसा मानसिक दबाव कभी मेरे भाइयों पर मैंने नहीं देखा…अगर वे खुद एक गिलास भी उठाकर रख दें….तो उनकी तारीफों के पुल बाँध दिए जाते हैं। भूले – भटके अगर अगर किसी लड़के को खाना बनाने में रुचि हो भी जाए तो माताएँ उनको रसोईघर से बाहर धकेल देती हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों होता है कि सबको काम करती हुई बहू तो पसन्द है मगर काम करते हुए दामाद नहीं भाते…अगर बेटियों की सहायता करते दामाद देख भी लिए जाएं तो ससुराल में या तो जीना हराम हो जाएगा या फिर बेटियों की ही क्लास लग जाएगी। यह समस्या व्यक्तिगत नहीं है बल्कि सामाजिक है और समाज के साथ आर्थिक विकास को बाधित करने वाली है मगर हम हैं कि न तो समझने को तैयार हैं और न ही सुधरने को तैयार हैं। आज भी घरेलू काम करने वाले पति ‘जोरू का गुलाम’ वाली नजर से देखे जाते हैं…दरअसल देखा जाए तो हम पुरुषों को दोष दे भी नहीं सकते क्योंकि उनकी यह सोच बनाने में खुद औरतों ने कड़ी मेहनत की है। कभी यह सोचा नहीं कि आज जिस बहू को कमतर बताने के लिए कर रही हैं, उसका खामियाजा बेटियों को भुगतना पड़ेगा..।
सच तो यह है कि घरेलू कामकाज में पुरुषों की भागीदारी से घर ही नहीं बल्कि देश और समाज भी सँवर सकते हैं। फर्ज कीजिए कि गृहिणियाँ जितना काम करती हैं या कामकाजी महिलाएँ, जिस तरह घर और बाहर की तमाम जिम्मेदारियाँ सम्भालती हैं, उसके श्रम का मूल्य लगाया जाए (कृपया इसे सम्वेदना से जोड़ने की गलती न करें), तो शायद आप यह राशि चुका भी न सकें। अमर उजाला में एक रिपोर्ट आयी है। इस रिपोर्ट के मुताबिक हाल ही में ऑक्सफैम की रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है कि दुनिया भर में हर साल महिलाएं 700 लाख करोड़ रुपये के ऐसे काम करती हैं, जिनका उन्हें मेहनताना नहीं मिलता। भारत में यह आँकड़ा छह लाख करोड़ रुपये का है। दुनिया भर में महिलाओं को लेकर एक ही सोच है कि उनका काम घर-परिवार की देखभाल करना है। इस सोच पर 2017 में मद्रास उच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में अहम टिप्पणी देते हुए कहा था कि एक महिला बिना कोई भुगतान लिए घर की सारी देखभाल करती है। उसे होम मेकर (गृहिणी) और बिना आय वाली कहना सही नहीं है। महिला सिर्फ एक माँ और पत्नी नहीं होती, वह अपने परिवार की वित्त मंत्री और चार्टर्ड अकाउंटेंट भी होती हैं। न्यायालय ने यह टिप्पणी पुडुचेरी बिजली बोर्ड की उस याचिका के सन्दर्भ में की थी, जिसमें बोर्ड को बिजली की चपेट में आकर मारी गई एक महिला को क्षतिपूर्ति के तौर पर चार लाख रुपये देने थे, जो कि बिजली बोर्ड को इसलिए स्वीकार नहीं थे, क्योंकि महिला एक गृहिणी थी और उसकी आय नहीं थी। न्यायालय ने बोर्ड की याचिका को अस्वीकार करते हुए कहा था कि हमें खाना पकाना, कपड़े धोना, सफाई करना जैसे रोजाना के कामों को अलग नजरिये से देखने की जरूरत है।

एरियल का अभियान

एक राष्ट्रीय सर्वे के मुताबिक, 40 प्रतिशत ग्रामीण और 65 प्रतिशत शहरी महिलाएं पूरी तरह घरेलू कार्यों में लगी रहती हैं। उससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि आँकड़ों के हिसाब से 60 से ज्यादा की आयु वाली एक चौथाई महिलाएं ऐसी हैं, जिनका सबसे ज्यादा समय घरेलू कार्य करने में ही बीतता है। पितृसत्तात्मक समाज में यह तथ्य गहरी पैठ बनाए हुए है कि स्त्री का जन्म सेवा कार्यों के लिए ही हुआ है। माउंटेन रिसर्च जर्नल के एक अध्ययन के दौरान उत्तराखंड की महिलाओं ने कहा कि वे कोई काम नहीं करतीं, पर विश्लेषण में पता चला कि परिवार के पुरुष औसतन नौ घंटे काम कर रहे थे, जबकि महिलाएं 16 घंटे। अगर उनके काम के लिए न्यूनतम भुगतान किया जाता, तो पुरुष को 128 रुपये और महिला को 228 रुपये मिलते। ऋतु सारस्वत का यह आलेख है जिसमें इस विषय पर उन्होंने बड़ी बारीकी से बात की है। वह कहती हैं कि कुछ देशों एवं संस्थानों ने घरेलू अवैतनिक कार्यों का मूल्यांकन करने के लिए कुछ विधियों का प्रयोग शुरू किया है। इन विधियों में से एक टाइम यूज सर्वे है यानी जितना समय महिला घरेलू अवैतनिक कार्यों को देती है, यदि उतना ही समय वह वैतनिक कार्य के लिए देती, तो उसे कितना वेतन मिलता। कई देशों ने अवैतनिक कार्यों की गणना के लिए मार्केट रिप्लेसमेंट कॉस्ट थ्योरी का भी इस्तेमाल किया है। यानी जो कार्य अवैतनिक रूप से गृहिणियों द्वारा किए जा रहे हैं, यदि उन सेवाओं को बाजार के माध्यम से उपलब्ध कराया जाए, तो कितनी लागत आएगी। संयुक्त राष्ट्र के रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर सोशल डेवलपमेंट से जुड़े डेबी बडलेंडर ने द स्टैटिस्टिकल एविडेंस ऑन केयर ऐंड नॉन केयर वर्क अक्रॉस सिक्स कंट्रीज नामक अपने अध्ययन में, अर्जेंटीना, भारत, रिपब्लिक ऑफ कोरिया, निकारागुआ, दक्षिण अफ्रीका तथा तंजानिया का अध्ययन करने के लिए टाइम यूज सर्वे विधि का प्रयोग कर पाया कि अर्जेंटीना में जहां प्रतिदिन पुरुष 101 मिनट और महिला 293 मिनट अवैतनिक घरेलू कार्य करती हैं, वहीं भारत में पुरुष प्रतिदिन 36 मिनट और महिलाएं 354 मिनट अवैतनिक घरेलू कार्य करती हैं। दुनिया भर में कुल काम के घंटों में से महिलाएं दो तिहाई घंटे काम करती हैं, पर वह केवल 10 प्रतिशत आय ही अर्जित करती हैं और वे विश्व की मात्र एक प्रतिशत सम्पत्ति की मालकिन हैं।

यहाँ विडम्बना देखिए कि औरतों को हमेशा यह समझाया जाता है कि सब कुछ उसका ही है और मजे की बात यह है कि इस थ्योरी की बात करते समय उसका यह अधिकार तक आप नहीं देते कि वह अपनी मर्जी से परदा तक खरीदे, जमीन -जायदाद के बारे में उसे निर्णय का अधिकार देना तो दूर की बात है। अधिकतर मामलों में औरतें दूध का हिसाब तो समझ सकती हैं मगर घर में कितना पैसा आया, कितना और कहाँ निवेश हुआ..इस बात को लेकर उनको समझाया जाता है कि उनको तो बुद्धि ही नहीं है। औरतें भी खुद को कमतर मानती हैं और वह भी स्वीकार कर लेती हैं कि वे ये तमाम आर्थिक बातें नहीं समझेंगी, नतीजा यह होता है कि न तो आप उनको आगे बढ़ाने की कोशिश करते हैं और न ही वे खुद आगे बढ़ना चाहती हैं….ऐसे तो कुछ नहीं बदलेगा भाई साहब, जो आपकी पत्नी के साथ हो रहा है, हमें नहीं लगता कि आप चाहेंगे कि आपके दामाद आपकी बेटियों के साथ करें…तो इसका एक ही रास्ता है कि पहल इस बार आप करें..। कारण यह है कि सत्ता आपके पास है, सम्पत्ति और अधिकार आपके पास हैं तो बदलाव की जिम्मेदारी भी आप ही को उठानी होगी..अगर आप समझेंगे तो समाज समझेगा और देश आगे बढ़ेगा।
आज से 10 -15 साल पहले शायद हम इस मुद्दे की चर्चा तक भी नहीं करते मगर समय बदल रहा है और औरतों की निर्णयात्मक भागीदारी की बात अब विज्ञापनों के जरिए भी हो रही है। डिटर्जेंट कम्पनी एरियल ने एक नया विज्ञापन पेश किया है जो कार्यभार बाँटने की बात करता है, मतलब घरेलू कामकाज में लड़कों के हाथ बँटाने की बात करता है। अभियान है -हैशटैग शेयर द लोड। भारत में इस अभियान की शुरूआत समानता के मुद्दे पर की गयी थी, जहाँ खुशहाल परिवारों की आकांक्षा की जाती है, जिसमें पुरुष और महिलाएं लोड यानी घरेलू कामकाज समान रूप से शेयर करते हैं। माना जाता है कि बर्तन धोने और कपड़े धोने जैसे काम औरतों के हिस्से के ही हैं मगर विज्ञापनों के सकारात्मक पहल का नतीजा है कि आज ज्‍यादा पुरुष पहले से अधिक लोड शेयर कर रहे हैं। वर्ष में 2015 में, 79%* पुरुषों की सोच थी कि घरेलू काम सिर्फ औरतों का काम है। 2016 में, 63%* पुरुषों का मानना था कि घरेलू कामकाज औरत/बेटी का काम है और ‘बाहर’ का काम पुरूष/बेटे का काम है। 2018 में, यह संख्या घटकर 52%* हो गई है। इस प्रगति के बावजूद, अभी और काम किया जाना शेष है।
#ShareTheLoad के इस नए रिलीज किये गए संस्करण में, एरियल ने एक और प्रासंगिक सवाल उठाया है-क्या हम अपने बेटों को वही सीखा रहे हैं जो हम अपनी बेटियों को सिखा रहे हैं? माताओं को समाज का चेंज मेकर बनाने का आग्रह और इससे अपने बेटों की परवरिश करने के तरीके पर पुर्नविचार किया जा रहा है। हालांकि घर के बाहर के कामकाज को दोनों में बाँटा जाता है, लेकिन घरेलू कामकाज की जिम्मेदारी अभी भी महिला अकेले ही उठा रही है। जब पति घर के काम का लोड उठाने के लिए तैयार नहीं होता है, तो उसका पूरा भार महिलाओं के कंधों पर आ जाता है जो जिससे उसके कॅरियर की आकांक्षाओं और कार्य पर प्रभाव पड़ता है। वर्ष 2018 में एक स्वतंत्र तीसरी पार्टी द्वारा किए गए एक सर्वे में भी पाया गया था कि भारत में दस में से सात महिलाएं* घर की जिम्मेदारियों को संतुलित करने के लिए अपने काम की अतिरिक्त जिम्मेदारियों पर पुनर्विचार करती हैं। इस धारणा के साथ कि माताओं का एक मजबूत सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण होता है, एरियल माताओं की इस पीढ़ी को अपने बच्चों को समानता की पीढ़ी के रूप में पालने का आग्रह करता है। बीबीडीओ द्वारा परिकल्पित इस नई फिल्म के माध्यम से इस असमानता के कारणों में गहराई से जाना गया। अभियान बच्चों के पालन-पोषण के बारे में बात करना चाहता है। समान प्रगतिशील परिवारों में भी, हमारे बेटे और बेटियों की परवरिश के तरीके में अक्सर अंतर होता है। कुछ समय से, बेटियों को मजबूत, स्वतंत्र और सभी क्षेत्रों में उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए आश्वस्त किया जा रहा है लेकिन, वे शादी होते ही घरों की प्राथमिक देखभालकर्ता बन जाती हैं। इससे उन पर असंतुलित अपेक्षाएं और बोझ पड़ता है, जो उनके पेशेवर विकास के रास्ते में बाधा बन जाता है। हालांकि समाज बदल रहा है, लेकिन बेटों की अलग तरीके से परवरिश किये जाने पर ज्‍यादा ध्‍यान नहीं दिया जा रहा है। उदाहरण के लिए, उन्हें अपने भविष्‍य का बेहतर प्रबन्धन करने और उन्हें पारिवारिक समानता का पैरोकार बनाने में मदद करने के लिए उन्‍हें कपड़े धोना या खाना बनाना जैसे कुछ नए जीवन कौशल सिखाना।  वर्ष 2015 में, एरियल ने एक बहुत ही प्रासंगिक सवाल उठाया – क्या कपड़े धोना केवल एक महिला का काम है? ’घरेलू कामों के असमान वितरण पर ध्यान आकर्षित करने के लिए। वर्ष 2016 के ‘डैड्स शेयर द लोड’ अभियान के साथ, बातचीत का उद्देश्य असमानता के कारणों का पता लगाना था, जो कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक स्‍थानान्‍तरित होने वाले पूर्वाग्रह का चक्र है। अभियान पर टिप्पणी करते हुए, सोनाली धवन, मार्केटिंग डायरेक्टर, पी एंड जी इंडिया, और फैब्रिक केयर ने कहा, “इस वर्ष, हम इस असमानता के कारण की गहराई तक जाने के लिए बातचीत की पुन: शुरूआत करना चाहते हैं। सही परवरिश के संदर्भ में, हम भविष्य के लिए माताओं की इस पीढ़ी को चेंजमेकर बनाने का आग्रह करते हैं। जाहिर है कि काम साझा करना कम उम्र में सिखाया जाये, तो यह उनकी  मूल्य प्रणाली का एक हिस्सा बन जाता है। जोसी पॉल, क्रिएटिव डायरेक्टर, बीबीडीओ ने आगे कहा, “एरियल के #ShareTheLoad ने परिवार में लैंगिक समानता के लिए एक सक्रिय अभियान का रूप ले लिया है। इसने ब्रांड के लिए अधिकतम भावनात्मक इक्विटी उत्पन्न की है और समाज में एक सकारात्मक बदलाव की शुरूआत की है।

डब्‍ल्‍यूएआरसी ने इसे वर्ष 2017 और 2018 के लिए दुनिया के सबसे प्रभावी कैम्‍पेन के रूप में रैंक किया है। हम अभियान के अगले चरण को शुरू करने के लिए उत्साहित हैं। यह नया अभियान एक कड़वे सत्य पर आधारित है जो आज की सच्‍चाई है। इस फिल्म में, माता की एक अनिर्दिष्ट सामाजिक कंडीशनिंग का अहसास और उसका दृढ़ संकल्प समाज के लिए विचारशील, संवेदनशील और एक ऊँची छलांग है। उसका व्‍यवहार पुरुषों को घर में लोड शेयर करने का एक और कारण देता है। वर्ष 2018 में एक स्वतंत्र थर्ड पार्टी द्वारा किए गए एक सर्वे में भी पुरुष और महिला दृष्टिकोण में कुछ अंतर का पता चला था। 72% महिलाओं का मानना ​​है कि वीकैंड यानी सप्ताहांत सिर्फ किराने के सामान की खरीदारी, कपड़े धोने और घर के काम करने के लिए है, जबकि 68% भारतीय पुरुषों का मानना ​​है कि वीकैंड विश्राम के लिए हैं। घरेलू काम जैसे कपड़े धोने के बारे में, अभी भी अधिकांश महिलाएं सभी कार्यों की जिम्मेदारी अकेले ही सम्भालती हैं। 68% महिलाएं काम से वापस आती हैं और नियमित रूप से कपड़े धोने का काम करती हैं, जबकि पुरुषों में यह संख्या केवल 35% है। सच्‍चाई यह है कि, 40% भारतीय पुरुष वाशिंग मशीन चलाना नहीं जानते हैं। इसके अलावा, आधे से अधिक पुरुषों ने इस बात पर सहमति जताई कि वे इसलिए कपड़े धोना नहीं जानते क्योंकि उन्होंने कभी अपने पिता को ऐसा करते नहीं देखा है। कपड़े धोने के परिपेक्ष्‍य में, एरियल का नया संवाद एक माँ को अपने बेटे को कपड़े धोना सिखाता है। कम्पनी द्वारा जारी इस वीडियो फिल्म का निर्देशन इग्लिंश – विंग्लिश फेम गौरी शिंदे ने किया है।
यह स्वागतयोग्य है मगर इस सोच को आगे तो अकेले महिलाएं नहीं बढ़ा सकतीं…..आपकी भागीदारी चाहिए। कारण यह है कि अगर महिला आगे बढ़ी तो उसके पीछे खुद उसकी माँ और बहन से लेकर सास, ननद और गाँव तक की चाची, दादी, मामी, मासी सब पडेंगी…ऐसी स्थिति में ये आप ही होंगे जो इस बात को समझेंगे क्योंकि कल आपके बेटे को भी एक जिम्मेदार पति, पिता और नागरिक बनना है। ये बदलाव महिलाओं के सशक्तीकरण के साथ ही एक सशक्त व सन्तुलित समाज की जरूरत है…आप तैयार हैं न।

इनपुट – अमर उजाला पर ऋतु सारस्वत का आलेख और एरियल द्वारा जारी विज्ञप्ति

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