जनहित पत्रकारिता की पहली शर्त है

कोलकाता प्रेस क्लब तथा माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा हाल ही में कार्यरत पत्रकारों के लिए तीन दिवसीय पत्रकारिता कार्यशाला आयोजित की गयी थी। यह भाषण कार्यशाला के समापन समारोह में वरिष्ठ पत्रकार तथा माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति  प्रो.  जगदीश उपासने ने दिया था।यह वक्तव्य आपको पत्रकारिता और पत्रकार की जिम्मेदारियों के बारे  में बताता है। उम्मीद है कि पत्रकारों के साथ पत्रकारिता के विद्यार्थियों को भी यह एक नयी दिशा देंगे।  दूसरी कड़ी प्रस्तुत है

प्रो. जगदीश उपासने (कुलपति, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्‍वविद्यालय)

प्रिंट मीडिया तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सामने बड़ा संकट है। पाठकों की वफादारी अब किसी एक मीडिया के लिए नहीं है। डिजिटल मीडिया ने चुनौती ही नहीं दी है बल्कि पारम्परिक मीडिया को रिप्लेस भी किया है। आज युवाओं की पसन्द को ध्यान में रखा जा रहा है। उनकी पसन्द को ध्यान में रखकर चैनल आ रहे हैं।

2009 में नेशनल काउंसिल ऑफ अप्लाइड रिसर्च के मुताबिक न्यूज चैनल पसन्द के मामले में नौवें स्थान पर हैं। अखबार में पहले खेल का पन्ना पढ़ते हैं। सोशल मीडिया ने गेटकीपर के रूप में प्रिंट मीडिया की जिम्मेदारी खत्म कर दी है। खबरों की एक्सक्लूसिवनेस कम हो गयी मगर पत्रकारिता की मूल भावना कभी नहीं बदलती।

पत्रकार के लिए जुड़ना और जोड़ना बहुत जरूरी है। सोशल मीडिया ने यही किया है। अच्छी भाषा हर किसी लिखने वाले सभी को चाहिए। मीडिया की भाषा वही होनी चाहिए जो समाज में बोली जाती है। पत्रकारिता के बुनियादी उसूल कभी नहीं बदलते। खबरों में सच्चाई होनी चाहिए। तथ्य की सत्यता के प्रति आग्रह होना आवश्यक है।
जब हम सम्पादकीय लिखते हैं तो वह सम्बन्धित मीडिया समूह का विचार होगा। प्रेडिक्टेबल मत बनिए क्योंकि होना पत्रकार की साख गिराता है। पत्रकार लोगों को उनके काम की चीज सच्चाई के साथ बताते हैं मगर आज मीडिया की विश्वसनीयता ही सवालों के घेरे में है।
तकनीक आज महत्वपूर्ण है और उसका सही उपयोग करना जरूरी है। पत्रकारों में शिष्टाचार और अनुभवी पत्रकारों के लिए सम्मान होना जरूरी है। याद रखें कि कर्मचारी आप बाद हैं, पहले पत्रकार ही हैं।
हम जनहित के लिए हैं और जनहित पत्रकारिता की पहली शर्त है। मीडिया के सामने विश्‍वसनीनयता और पूँजी का संकट है मगर मैन्यूफक्चर्ड की गयी खबरें या ऐसे मीडिया संस्थान अधिक समय तक नहीं टिकते इसलिए तथ्यपूर्ण सत्य पत्रकारों का हथियार होता है।
अक्षर स्थायी हैं इसलिए प्रिंट मीडिया के भविष्य को लेकर चिन्ता करने की जरूरत नहीं है। मीडिया समाज के सहारे ही सर्वाइव कर सकता है। इंडिया पर ही नहीं, भारत पर भी ध्यान दीजिए।
(पत्रकारिता कार्यशाला के समापन समारोह में दिये गये भाषण के अंश)

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