जानिए होली और होलिका दहन की कुछ बातें…

होली भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है। इसके पीछे पौराणिक कथाएं तो हैं ही लेकिन मुख्यत: यह कृषकों का उत्सव है। रबी की फेसल के आसपास मनाया जाने वाले इस त्योहार के अर्थ बहु आयामी है और वसंत की भावनाओं के अनुरूप है। इसलिए भी होली देश का बहुत लोकप्रिय त्योहार है। यह भारतीय मूल के हिंदुओं द्वारा हर जगह मनाया जाता है, हालांकि यह मुख्य रूप से भारत और नेपाल के लोगों द्वारा मनाया जाता है।

कब मनाई जाती है?

ऐसा माना जाता है कि भद्रा काल में होलिका दहन नहीं करना चाहिए, इससे अशुभ फल की प्राप्ति होती है। 1 मार्च को शाम 7 बजे 37 मिनट पर भद्रा समाप्त हो जाएगा और इसके बाद से होलिका दहन किया जाना शुभ होगा। शास्त्रों में बताए गए नियमों के अनुसार इस साल होलिका दहन के लिए बहुत ही शुभ स्थिति बनी हुई है।

धर्मसिंधु नामक ग्रंथ के अनुसार होलिका दहन के लिए तीन चीजों का एकसाथ होना बहुत शुभ है क्क पूर्णिमा तिथि हो, प्रदोष काल हो और भद्रा न लगा हो। इस साल होलिका दहन पर ये तीनों संयोग बन रहे हैं। इसलिए होली आनंददायक रहेगी।

होली मनाने के कारण

होलिकोत्सव के पीछे पौराणिक कारण तो हैं ही, लेकिन इसका संबंध मौसम और हमारी अर्थव्यवस्था भी है। इसकी कथा हमें बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश देती है। यह ‘फगवाह” के रूप में भी जाना जाता है, क्योंकि यह हिंदू कैलेंडर के अंतिम मास फागुन में मनाया जाता है। होली ‘होला” से उन्पन्ना हुआ है। मूलत: यह ईश्वर से अच्छी फेसल पाने के लिए की जाने वाली पूजा है।

होलिका की कथा

होलिका दहन की कथा बुराई पर अच्छाई की विजय की कथा है। यह कथा प्रल्हाद की कथा है, होलिका और हिरण्यकश्यप की कथा है। प्रल्हाद ईश्वर को समर्पित एक बालक था, परंतु उसके पिता ईश्वर को नहीं मानते थे। वह बहुत दंभी, घमंडी और क्रूर राजा था। कहानी कुछ ऐसी है कि प्रल्हाद के पिता एक नास्तिक राजा थे प्रल्हाद हर समय ईश्वर का नाम जपता रहता था। इस बात से आहत होकर वह अपने पुत्र को सबक सिखाना चाहता था। उसने अपने पुत्र को समझाने के सारे प्रयास किए, किंतु प्रल्हाद में कोई परिवर्तन नहीं आया।

जब वह प्रल्हाद को नहीं बदल पाया तो उसने उसे मारने का विचार किया। इस उद्देश्य से उसने अपनी बहन की मदद ली। उनकी बहन को यह वरदान प्राप्त था कि यदि वह अपनी गोद में किसी को भी लेकर अग्नि में प्रलेश करेगी तो स्वयं उसे कुछ नहीं होगा, परंतु उसकी गोद में बैठा व्यक्ति जलकर भस्म हो जाएगा। राजा की बहन का नाम होलिका था।

होलिका ने प्रल्हाद को जलाने के लिए अपनी गोद में बैठाया था, परंतु प्रल्हाद के स्थान पर वह स्वयं जल गई और ‘हरि ऊं” का जाप करने और ईश्वर को समर्पित होने के कारण प्रहलाद की आग से रक्षा हो गई और वह सुरक्षित बाहर आ गया।

हेमाद्रि ने भविष्योत्तर से उद्धरण देकर एक और कथा कही है। युधिष्टिर ने कृष्ण से पूछा कि फागुन मास में हरेक गांव-नगर और घर में उत्सव क्यों मनाया जाता है और होलाका क्यों जलाया जाता है उसमें किस देवता की पूजा की जाती है?

इकस उत्सव का प्रचार किया जाता है? इसमें क्या होता है और यह ‘अडाडा” क्यों कहीं जाती है। इसके जवाब में कृष्ण ने एक कथा सुनाई। राजा रघु के पास लोग यह कहने गए कि ‘डोण्ढा” नामक एक राक्षसी है, जिसे शिव ने वरदान दिया है कि उसे देव, मानव आदि नहीं मार सकते हैं और न वह अस्त्र-शस्त्र या जाड़ा या गर्मी या वर्सा से मर सकती है।

किंतु शिव ने इतना कह दिया कि वह खेलते-मस्ती करते बच्चों से भयभीत रहेगी। तब पुरोहित ने मुहुर्त निकाला और कहा कि फागुन की पूर्णिमा को जब जाड़ा खन्म होगा और ग्रीष्म का आगमन होगा, तब लगो लोग हंसे और आनंद मनाएं, बच्चे सूखी पत्तियां और टहनियां इकट्ठा करें।

रक्षोघ्न मंत्रों के साथ उसमें आग लगाएं, तालियां बजाएं, अग्नि की तीन बार प्रदक्षिणा करें, आनंद मनाएं, इसी शोरगुल-अट्टहास और होम से वह राक्षसी मरेगी। जब राजा ने यह सब करवाया तो राक्षसी मर गई और वह दिन ‘अडाडा” या ‘होलिका” कहा गया।

आगे पुराण में आया कि ‘जब शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि पर पतझड़ समाप्त हो जाता है और वसंत ऋतु का प्रात: आगमने होता है तो जो व्यक्ति चंदन के लेप के साथ आम्र-मंजरी खाता है वह आनंद से रहता है।

इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि होलिका भूतकाल के बोझ का सूचक है जो प्रल्हाद की निश्छलता को जला देना चाहती थी। परंतु नारायण भक्ति की गहराई तक जुड़े हुए प्रल्हाद ने सभी पुराने संस्कारों को स्वाहा कर दिया और फिर नए रंगों के साथ आनंद का उद्गम हुआ। जीवन एक उन्सव बन जाता है।

भूतकाल को छोड़कर हम एक नई शुरुआत की तरफ बढ़ते हैं। हमारी भावनाएं आग की तरह हमें जला देती हैं, परंतु जब रंगो का फव्वारा फूटता है तब हमारे जीवन में आकर्षण आ जाता है। अज्ञानता में भावनाएं एक बोझ के समान होती है, जबकि ज्ञान में वही भावनाएं जीवन में रंग भर देती है।

सभी भावनाओं का संबंध एक रंग से होता है। जैसे कि – लाल रंग क्रोध से, हरा ईर्ष्या से, पीला पुलकित होने या प्रसन्नाता से, गुलाबी प्रेम से, नीला रंग विशालता से, श्वेत शांति से और केसरिया संतोष/त्याग और बैंगनी ज्ञान से जुड़ा हुआ है।

 

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