पत्रकारिता में सर्वमान्य, अंतिम और शाश्वत कुछ नहीं होता

 

प्रो. जयराम शुक्ल, प्रभारी, रीवां परिसर, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संंचार विश्वविद्यालय

कोलकाता प्रेस क्लब तथा माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा हाल ही में कार्यरत पत्रकारों के लिए तीन दिवसीय पत्रकारिता कार्यशाला आयोजित की गयी थी। कोलकाता प्रेस क्लब तथा माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा हाल ही में कार्यरत पत्रकारों के लिए तीन दिवसीय पत्रकारिता कार्यशाला आयोजित की गयी थी।हमने अपराजिता में सभी वक्तव्य आपके सामने रखे हैं और उम्मीद है कि पत्रकारों के साथ पत्रकारिता के विद्यार्थियों को भी यह एक नयी दिशा देंगे।

कार्यशाला में कुलपति जगदीश उपासने तथा कुलसचिव संजय द्विवेदी  ने बदलते समय की पत्रकारिता और उसकी चुनौतयों पर विस्तृत चर्चा की। विश्वविद्यालय के रीवा परिसर के प्रभारी जयराम शुक्ल ने  लगातार तीन दिनों तक पत्रकारिता के इतिहास, महिलाओं के योगदान, संवाददाता की चुनौतियों और समस्याओं के अतिरिक्त पत्रकारिता और उसकी जरूरतों के बारे में भी बताया। तीसरी और अंतिम कड़ी में पढ़िए प्रो. जयराम शुक्ल के वक्तव्य के कुछ खास अंश 

 

 

हिन्दी पत्रकारिता की शुरुआत करने वाले लोग पेशेवर नहीं थे, वे साहित्य के लोग थे
मीडिया में हम समाजसेवा के लिए नहीं सृजनात्मकता की चाह के साथ आते हैं। पत्रकारिता का मूल चरित्र हिक्की गजट में दिखता है। इसने पहले ही अंक में पर्दाफाश करना शुरू कर दिया था मगर तब भी उसमें समाज सेवा नहीं थी, आज भी नहीं है। यह विशुद्ध रूप से प्रोफेशन है। हिन्दी को सम्पर्क भाषा बनाने की माँग भी अहिन्दी भाषी प्रदेशों में उठी। आरम्भिक हिन्दी पत्रकारिता पर साहित्य का प्रभाव अधिक दिखता है। हिन्दी पत्रकारिता की शुरुआत करने वाले लोग पेशेवर नहीं थे, वे साहित्य के लोग थे। हिन्दुस्तान में आज बोली जाने वाली भाषा हिन्दी सबसे युवा भाषा है।
पत्रकारिता एक क्राफ्ट है
पत्रकारिता एक क्राफ्ट है। पत्रकार बिखरे हुए तथ्यों को जोड़कर उसे पठनीय बनाता है। पत्रकार के लिए तथ्यों को लेकर स्पष्ट रहना जरूरी है। उसके पास एक व्यापक दृष्टि होनी चाहिए। हिन्दी सम्वाद और सम्पर्क की भाषा है और यही उसकी खूबी है। पत्रकार के लिए भाषा संवाद का हथियार है और लिपि उसकी संवाहक है। हिन्दी प्रवाहमान भाषा है। बोलियाँ निकाल दें तो उसमें कुछ नहीं बचता। हिन्दी की धारण करने की क्षमता ही उसे विशिष्ट बनाती है।
नवजागरण काल में अखबार राजनीतिक लड़ाई का हथियार था
प्रश्न यह है कि पत्रकारिता का जन्म बंगाल से ही क्यों हुआ? जब किसी को दबाया जाता है तो विद्रोह भी सबसे पहले वहीं से आरम्भ होता है। बंगाल तत्कालीन समय में बहुत सी रूढ़ियों से जकड़ा था और उससे निकलने की छटपटाहट में ही यहाँ सबसे पहले राजनीतिक, साहित्यिक, दार्शनिक चेतना आयी जिसका केन्द्र कलकत्ता था। अँग्रेजी के पत्रकार अँग्रेजों के साथ चले तो हिन्दी के पत्रकार साहित्य के साथ चले और उनका खिंचाव कोलकाता की ओर था। वे जनचेतना, समाज सुधार, राजनीतिक आन्दोलन लेकर चले। अखबार राजनीतिक लड़ाई का हथियार था। अगर राजनीतिक योगदान को छोड़ दें तो महात्मा गाँधी बहुत अच्छे पत्रकार थे। उन्होंने इंडियन ओपिनियन, यंग इंडिया, हरिजन जैसे अखबारों का सम्पादन किया। बाल गंगाधर तिलक ने मराठा और केसरी, गणेश शंकर विद्यार्थी ने प्रताप जैसे पत्र निकाले। अमृतबाजार पत्रिका के कारण ही वर्नाक्यूलर एक्ट लागू आया। पत्रकारिता इस समय तक यूरोप में प्रोफेशन बन चुकी थी मगर भारत में पत्रकारों को समाज सुधार का माध्यम माना जाता था। इस आभामण्डल से हिन्दी पत्रकारिता आज भी मुक्त नहीं हो सकी है। लोग तब अखबार में सहयोग राशि या चन्दा माँगते थे। उसके बाद मूल्य और अब कीमत शब्द का प्रयोग किया जाने लगा है।
पाठक ग्राहक, फिर रीडर और अब कस्टमर बन गया है
मेल भारतीय संस्कृति में एक पवित्र शब्द है। तब हर अखबार जोड़ता था। आजादी के बाद मेल शब्द का मतलब बदल गया, पाठक ग्राहक, फिर रीडर और अब कस्टमर बन गया है। मिशन प्रोफेशन बन चुका है। आज जो बिल्कुल भी न लिखे, वही योग्य पत्रकार माना जाता है। अँग्रेजी के पत्रकारों को उनकी फेस वैल्यू के कारण अधिक महत्व मिल रहा है। कई बड़े अँग्रेजी पत्रकारों के लेखों का अनुवाद कर हिन्दी अखबारों में छापा जा रहा है। हिन्दी के पत्रकारों को किया जाने वाले भुगतान अँग्रेजी की तुलना में आधा है। हिन्दी के बहुत कम अखबार हैं जो हिन्दी में लिखने वालों को पारिश्रमिक देते हैं।
पत्रकारिता वह है, जो रोज पुराने मानदंडों को तोड़ती हो
भाषा के सन्दर्भ में श्याम रुद्र पाठक का जिक्र आवश्यक है जिन्होंने हिन्दी के लिए आन्दोलन किया। धरना देते रहे और अन्त में कई महीनों के बाद उनको तिहाड़ जेल में डाल दिया गया। अँग्रेजी आज भी स्टेटस की भाषा मानी जाती है और कॉरपोरेट को हिन्दी उनका माल बेचने के लिए चाहिए। हिन्दी का साहित्य सबसे अधिक पढ़े जाने वाले लेखक को साहित्यकार ही नहीं मानता। आरम्भिक दिनों में समालोचकों ने निराला का भी विरोध किया था। किताबें उतनी ही लिखी जा रही हैं जितनी समीक्षकों तक पहुँच सकें। हिन्दी को जनभाषा बनने में अड़चनें डाली जा रही हैं और इस कमी को पूरा किया है हिन्दी के अखबारों ने। जनसत्ता ने हिन्दी अखबारों के प्रति लोगों का नजरिया बदला। राजधानी दिल्ली में इस अखबार ने हिन्दी पत्रकारिता को अँग्रेजी पत्रकारिता के समकक्ष लाकर खड़ा किया। जनसत्ता ने पत्रकारों को सशक्त बनाया। ये वह अखबार था जिसने भोपाल गैस कांड को पहले ही भाँप लिया था। हिन्दी में नवाचार शुरू हुए तो जनता ने भी हाथों -हाथ लिया। अखबारों के लिए गरीबों की कहानी महत्वपूर्ण नहीं है मगर देशबन्धु ने ग्रामीण पत्रकारिता के क्षेत्र में गहरी छाप छोड़ी। पत्रकारिता वह है, जो रोज पुराने मानदंडों को तोड़ती हो।
पत्रकारिता में सर्वमान्य, अंतिम और शाश्वत कुछ नहीं होता
जो पत्रकार होता है, वह जीवन भर पत्रकार रहता है। पत्रकार के लिए अपनी बीट से हटकर भी चीजें जानना जरूरी है। उसे हमेशा अपडेट रहना चाहिए। अगर पत्रकारिता की बात की जाए तो भोपाल का सप्रे सँग्रहालय इस लिहाज से पत्रकारों और पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए काफी महत्वपूर्ण है। पत्रकारिता में सर्वमान्य, अंतिम और शाश्वत कुछ भी नहीं होता। संवाददाता न्यूज सेंस का मास्टर होता है। खबरों को सँवारना डेस्क का काम होता है मगर संवाददाता जब अपनी खबर खुद लिखता है तो उसे उपसम्पादक की जिम्मेदारी भी सम्भालनी पड़ती है इसलिए भाषा का ज्ञान बेहद आवश्यक है।
महिलाओं के प्रति समानता तभी होगी, जब आचरण समान होगा
महिलाओं के योगदान की बात करें तो पश्चिम बंगाल नेतृत्व करता है। रतलान की हेमन्त कुमारी देवी ने 1888 में सुगृहिणी नामक पत्रिका का सम्पादन किया। 1856 में भारती नाम की पत्रिका निकली जिसकी सम्पादक स्वर्ण कुमारी देवी थीं। इनका सम्बन्ध टैगोर परिवार से था। सरला देवी ने परम्परा निकाली। हिन्दी पत्रकारिता में भारतेन्दु का बड़ा नाम है। उन्होंने बाल, राजनीतिक पत्रिका निकाली। उन्होंने बाला बोधिनी प्रकाशित की। नवजागरण काल में भी महिलाओं का योगदान है और समानता तभी होगी जब आचरण समान होगा। इस देश में आर्थिक विपन्नता की शिकार सबसे अधिक महिलाएँ ही हैं। तत्कालीन समय में भी बंगाल में महिलाओं की स्थिति बहुत ज्यादा खराब थी और बंगाल में महिलाओं ने सबसे अधिक आवाज बुलन्द की। आशापूर्णा देवी, महाश्वेता देवी इसका उदाहरण हैं मगर 6ठीं शताब्दी के पहले ऐसी स्थिति नहीं थी। मंडन मिश्र की पत्नी ने आदि शंकराचार्य से शास्त्रार्थ किया। आज स्थिति यह है कि महिला आरक्षण का मसला संसद में सत्र के अंतिम दिन उठाया जाता है। पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत सत्य है। जिस दिन किसी पत्रकार ने सत्य का मर्दन किया, उसी दिन आप शून्य हो गये।
पत्रकार अपने विवेक का इस्तेमाल करने के लिए स्वतन्त्र नहीं हैं
प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया, प्रेस की मर्यादा और अनुशासन बनाकर रखती है मगर कार्रवाई करने का अधिकार उसे नहीं है। पत्रकारिता आज विश्वसनीयता के संकट से गुजर रही है। उदारीकरण के बाद वैश्वीकरण के दौर में ही जी न्यूज, स्टार न्यूज जैसे चैनल आये। आज हर खबर सन्देह से देखी जा रही है। चैनलों में जो दिखाया जाता है, वह सब पहले से तय होता है। राजनीति भी आज शो बिजनेस हो गयी है। सोशल मीडिया पर डेटा चुराकर आँकड़ों का व्यवसाय किया जा रहा है। फेक अकाउंट और धार्मिक ध्रुवीकरण ट्रोल करने वालों का खेल है। यह ध्रुवीकरण 1984 से चला आ रहा है जब मीडिया, समाचार और चुनाव में हस्तक्षेप हुआ। भ्रामक प्रचार तब भी हो रहा था। पत्रकार अपने विवेक का इस्तेमाल करने के लिए स्वतन्त्र नहीं हैं। आज मीडिया संस्थानों का एक टारगेट ग्रुप है और वह उनके लिए काम करता है। मीडिया आज कस्बों और ग्रामीण इलाकों के लिए काम नहीं करते। गाँव और किसान अखबारों के केन्द्र में नहीं है। वह आँकड़ों में आता है और तब आता है जब इन आँकड़ों से सत्ता को हिलाया जा सके।
संवाददाता के पास जासूस और अन्वेषक की दृष्टि होना जरूरी है
जोखिम लेने का जज्बा आपको पत्रकार बनाता है। एक संवाददाता जिस दिन पार्टी बन जाता है, उसके भीतर बसा संवाददाता खत्म हो जाता है। रिपोर्ट तथ्यों के साथ रखी जानी चाहिए। संवाददाता को एक वकील भी होना चाहिए। वह हमेशा भावशून्य, निरपेक्ष और तथ्यपूर्ण होता है। खबरों को जस का तस, तथ्यों के साथ रखें। पत्रकार वह है जो खबर की तलाश में कहीं भी जा सकता है। संवेदना के साथ आप संवाददाता नहीं रह सकते मगर वह सम्पादन करता हो तो दोहरी जिन्दगी जीता है। संवाददाता खबर खोजता नहीं बल्कि खबर सूँघता है। जब तक उसकी खोज पूरी नहीं होती, वह किसी पर उंगली नहीं उठाता। वह न्यूजफुल चीजों को देखता चलता है। संवाददाता के पास जासूस और अन्वेषक की दृष्टि होना जरूरी है।
अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का दुरुपयोग पत्रकारों ने किया है
समाज के हित में कई खबरों को नजरअन्दाज करना पड़ता है। संवाददाता में लचीलापन होना जरूरी है। खुद को परम ज्ञानी मानने की गलती न करें। पत्रकार की आँख और उसके कान खुले होने चाहिए। उसके लिए सूत्र यानी सोर्स महत्वपूर्ण होते हैं और यह आपके कौशल पर निर्भर करता है। आज का पत्रकार कई सीमाओं में बँधा है। उसके अधिकार आम आदमी से भी कम हैं। पत्रकार के पास पत्रकार होने का प्रमाणपत्र तक नहीं है। यह भी कटु सत्य है कि अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का दुरुपयोग पत्रकारों ने किया है। श्रमजीवी पत्रकार भी श्रम कानूनों के अन्तर्गत ही आता है।
पत्रकारिता में पुनरावृत्ति एक दोष है

सम्प्रेषणीयता और संवादशैली पत्रकारिता की विशेषता है। कलाकार भी कम्यूनिकेटर होता है। सृजनात्मक लेखन पत्रकारिता से भी जुड़ा होता है। आप सााहित्य से उक्तियाँ ले सकते हैं। सम्पर्क कौशल अभ्यास से आता है। अगर आपके पास शब्द नहीं हैं तो आप बहुत देर तक नहीं बोल सकते। पत्रकारिता में पुनरावृत्ति एक दोष है। निकट भविष्य में सबसे अधिक संकट संवाददाता के सामने ही है। सोशल मीडिया ने लोगों को इतना सशक्त बना दिया है कि उन तक खबर आपके पहुँचाने से पहले पहुँच जा रही है।
अखबार अब विश्लेषण के लिए पढ़े जायेंगे
पत्रिकायें बन्द हो रही हैं। अखबार अब स्पेस सेल कर रहे हैं। बिलखते बच्चे की कहानी को कोई विज्ञापन रिप्लेस कर रहा है। पाठक रीडिंग मटेरियल चाहता है। दैनिक अखबारों के सामने वायरल होती खबरें हैं। अखबार अब फर्स्ट हैंड खबरों के लिए नहीं बल्कि विश्लेषण के लिए पढ़े जायेंगे। इस ट्रेन्ड को 1983 में सबसे पहले जनसत्ता ने भाँपा और उसी के अनुसार बदलाव किये। आज सभी अखबार इसी दिशा में चल रहे हैं। अब कई अखबार खुद को पत्रिका कहने लगे हैं। खबर एक सप्ताह, माह में रंग बदलती है। न्यू मीडिया ने संवाददाता की मेहनत खत्म कर दी है।
आप प्रभावशाली, बोधगम्य लिखेंगे तो आप बाजार पर भारी पड़ेंगे
दो ताकतें हैं जिनमें से एक बाजार को अपने अनुसार बना लेती है और दूसरी जो बाजार के अनुरूप खुद को ढाल लेती हैं। दोनों का अपना महत्व है। नया मीडिया खुद को बाजार के मुताबिक ढालता है मगर यह सत्य है कि आप प्रभावशाली, बोधगम्य लिखेंगे तो आप बाजार पर भारी पड़ेंगे। हमारी अपनी वरीयता है और यह सम्पादक पर निर्भर करता है कि वह किसे खबर मानता है। स्थानीय मुद्दों पर सम्पादकीय बड़ी बात मानी जाती है। अब सम्पादकीय पीछे के पन्नों में आ रहा है। किसी एक दफ्तर में दिन -भर की गतिविधि का आकलन भी खबर बन सकता है।
जिम्मेदार पत्रकार होने के नाते विकल्प और समाधान भी दें
भाषा आपको खुद अर्जित करनी होगी। वह कोई आपको सिखा नहीं सकता है। संवाददाता, लेखक और सम्पादक जितना पढ़ें, उतना अच्छा होगा। फीचर में विश्लेषण के साथ शब्द सामर्थ्य तथ्य को नयापन देकर बेहतर बनाता है। सम्पादकीय अखबार की आत्मा है। इसमें विश्लेषण के साथ एक सन्देश भी होता है। वह तथ्यगत विस्तार व आँकड़ों के साथ आता है। आपको सन्दर्भ जोड़ने होंगे। जिम्मेदार पत्रकार होने के नाते विकल्प और समाधान भी दें।
मुद्रित भविष्य विश्वसनीय और आराधनीय है
फिर भी प्रिंट मीडिया का भविष्य उज्ज्वल है क्योंकि अक्षर और शब्द हमारी आस्था का प्रश्न हैं। शब्द को ब्रह्म कहा गया है। सिख धर्म तो पूरी तरह गुरु ग्रन्थ साहिब पर आधारित है। अक्षर वह है जिसका क्षरण नहीं होता। वह शाश्वत है। यूरोप में विकास होने के बावजूद बाइबिल अभी भी है। मुद्रित भविष्य विश्वसनीय और आराधनीय है।

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