बहिष्कार, ब्लेम गेम, धर्म और राजनीति में पीछे धकेल दी गयी औरत…दफन हो गये बच्चे

सुषमा कनुप्रिया

महीने बीत गये…साल गुजर गये….सदियाँ गुजर गयीं…वक्त बदला मगर नहीं बदला तो औरतों को देखने का नजरिया। मैं कल्पना कर रही हूँ कि महाभारत काल में अगर सोशल मीडिया होता तो क्या होता….पक्ष – विपक्ष की राजनीति होती…सब ताल ठोंकते और इसके बाद ये बहिष्कार और वह बहिष्कार का ब्लेम गेम खेला जाता। सब होता मगर वह न होता जो हुआ…द्रोपदी…भाग्यशाली थी….अब लगता है…। कहते हैं कि लेखन प्रतिरोध का सशक्त माध्यम है मगर प्रतिरोध आप कैसे करेंगे….अधिक से अधिक सुविधाजनक तरीका अपनाकर? कुछ दिन के लिए अपनी तस्वीर की जगह काला रंग भर देंगे…उससे क्या होगा…एक दिन की खबर बनेगी…फिर…? यह विडंबना है कि भारतीय समाज में जैसे-जैसे स्वतंत्रता और आधुनिकता का विस्तार हुआ, वैसे-वैसे महिलाओं के प्रति संकीर्णता का भाव बढ़ा है। प्राचीन समाज ही नहीं आधुनिक समाज की दृष्टि में भी महिलाएं मात्र औरत हैं और उन्हें थोपी व गढ़ी-बुनी गयी तथाकथित नैतिकता की परिधि से बाहर नहीं आना चाहिए। इसी मानसिकता का घातक परिणाम है कि महिलाओं के प्रति छेड़छाड़, बलात्कार, यातनाएं, अनैतिक व्यापार, दहेज मृत्यु तथा यौन उत्पीड़न जैसे अपराधों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है. यह स्थिति तब है जब देश में महिलाओं को अपराधों के विरुद्ध कानूनी संरक्षण हासिल है। औरतें तो औरतें…अब तो बच्चों को भी नहीं छोड़ा जा रहा। 6 माह से 8 साल….और 8 साल से 70….घिना गये….उससे क्या होगा…भाग सकते हैं क्या हालात से?

गौरतलब है कि भारतीय महिलाओं को अपराधों के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करने तथा उनकी आर्थिक तथा सामाजिक दशाओं में सुधार करने हेतु ढ़ेर सारे कानून बनाए गए हैं।  इनमें अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम 1956, दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961, कुटुम्ब न्यायालय अधिनियम 1984, महिलाओं का अशिष्ट-रुपण प्रतिषेध अधिनियिम 1986, गर्भाधारण पूर्व लिंग-चयन प्रतिषेध अधिनियम 1994, सती निषेध अधिनियम 1987, राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम 1990, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005, बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006, कार्यस्थल पर महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध, प्रतितोष) अधिनियम 2013 प्रमुख हैं। कितनी औरतों को पता है और जिनको पता नहीं है…उनको बताने के लिए कितनी कोशिश कर रहे हैं आप?

इसके अलावा राजधानी दिल्ली में 16 दिसंबर, 2012 को हुई नृशंस सामूहिक बलात्कार की घटना के विरुद्ध राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित आक्रोश की पृष्ठभूमि में ‘दंड विधि (संशोधन) 2013 पारित किया गया और यह कानून 3 अप्रैल, 2013 को देश में लागू हो गया। इस कानून में प्रावधान किया गया है कि तेजाबी हमला करने वालों को 10 वर्ष की सजा और बलात्कार के मामले में अगर पीड़ित महिला की मृत्यु हो जाती है तो बलात्कारी को न्यूनतम 20 वर्ष की सजा होगी। इसके साथ ही महिलाओं के विरुद्ध अपराध की एफआईआर दर्ज नहीं करने वाले पुलिसकर्मियों को दंडित का भी प्रावधान है। इस कानून के मुताबिक महिलाओं का पीछा करने और घूर-घूर कर देखने को भी गैर जमानती अपराध घोषित किया है। साथ ही 15 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ यौन संबंध बनाने को बलात्कार की श्रेणी में रखा गया है लेकिन त्रासदी है कि इन कानूनों के बावजूद भी महिलाओं पर अत्याचार थमने का नाम नहीं ले रहा है।

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष तथा वाशिंगटन स्थित संस्था ‘इंटरनेशनल सेंटर पर रिसर्च ऑन वुमेन’(आईसीआरडब्ल्यु) से उद्घाटित हुआ है कि भारत में 10 में से 6 पुरुषों ने कभी न कभी अपनी पत्नी अथवा प्रेमिका के साथ हिंसक व्यवहार किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह प्रवृत्ति उनलोगों में ज्यादा है जो आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 52 फीसद महिलाओं ने स्वीकारा है कि उन्हें किसी न किसी तरह हिंसा का सामना करना पड़ा है। इसी तरह 38 फीसद महिलाओं ने घसीटे जाने, पिटाई, थप्पड़ मारे जाने तथा जलाने जैसे शारीरिक उत्पीड़नों का सामना करने की बात स्वीकारी है। पति परमेश्वर है…और अपना समझकर पीटा जैसे जुमले जब तक हैं….भूल जाइए कि कुछ होने वाला है। एनसीआरबी द्वारा जारी 2016 के आंकड़ों में महिलाओं और बच्चियों के साथ अपराधों में मेट्रो शहरों में जहां दिल्ली को शीर्ष स्थान दिया गया है, वहीं सामूहिक दुष्कर्म के मामलों में हरियाणा अव्वल रहा।

हरियाणा राज्य में 2011 की जनगणना के मुताबिक, प्रति 1000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या 879 थी। सीएडब्ल्यू सेल द्वारा 2017 के अंत में जारी किए गए आंकड़ों ने महिलाओं की स्थिति की जमीनी हकीकत खोल कर रख दी है। सेल द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, 2017 के एक जनवरी से 30 नवंबर के बीच राज्य में 1,238 महिलाओं के साथ दुष्कर्म के मामले दर्ज किए गए। यानी राज्य में प्रत्येक दिन कम से कम चार महिलाओं के साथ दुष्कर्म हुए। इसके अलावा समान समयावधि में महिला उत्पीड़न के 2,089 मामले दर्ज हुए। एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक, 2016 के दौरान हरियाणा में सामूहिक दुष्कर्म के 191 मामले दर्ज किए गए, जो देश के सबसे बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश से कहीं ज्यादा हैं। वहीं तमिलनाडु में केवल तीन और केरल में सामूहिक दुष्कर्म के 19 मामले दर्ज किए गए।  वहीं बात की जाए देश के अन्य राज्यों की तो राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के 2016 के आंकड़ें अलग कहानी बयां करते हैं। 2015 में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की संख्या 3,29,243 थी जो 2016 में 2.9 फीसदी की वृद्धि के साथ बढ़कर 3,38,954 हो गई। इन मामलों में पति और रिश्तेदारों की क्रूरता के 1,10,378 मामले, महिलाओं पर जानबूझकर किए गए हमलों की संख्या 84,746, अपहरण के 64,519 और दुष्कर्म के 38,947 मामले दर्ज हुए हैं। वर्ष 2016 के दौरान कुल 3,29,243 दर्ज मामलों में सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में 49,262, दूसरे स्थान पर पश्चिम बंगाल में 32,513 मामले, तीसरे स्थान पर मध्य प्रदेश 21, 755 मामले , चौथे नंबर पर राजस्थान 13,811 मामले और पांचवे स्थान पर बिहार है जहां 5,496 मामले दर्ज हुए। एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में अपराध की राष्ट्रीय औसत 55.2 फीसदी की तुलना में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में उच्चतम अपराध दर 160.4 रही। वहीं बात करें मेट्रो शहरों में महिलाओं के साथ अपराधों की तो दिल्ली इस सूची में शीर्ष पर है। 2016 के दौरान मेट्रो शहरों में महिलाओं के साथ अपराध के कुल 41,761 दर्ज हुए जिसमें 2015 के मुकाबले 1.8 फीसदी की वृद्धि देखी गई। 2015 में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की संख्या 41,001 थी। 2016 के दौरान पति और रिश्तेदारों की क्रूरता के 12,218 (दिल्ली 3,645 मामले), महिलाओं पर जानबूझकर किए गए हमलों की संख्या 10,458 (दिल्ली 3,746), अपहरण के 9,256 (दिल्ली 3,364) और दुष्कर्म के 4,935 (दिल्ली 1,996) मामले दर्ज किए गए। मेट्रो शहरों में 77.2 की राष्ट्रीय औसत दर की तुलना में दिल्ली में 182.1 फीसदी की सबसे ज्यादा अपराध दर रही।वहीं 2016 में महाराष्ट्र में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 4,037 मामले, बेंगलुरू में 1,494, जयपुर में 1,008 और पुणे में 354 मामले दर्ज हुए।

 

समस्या की जड़ तो कहीं और है

विरोध के तौर पर आपने एक समाचार पत्र का बहिष्कार कर दिया मगर हर एक मीडिया तो वही काम कर रहा है…खबरों को सनसनीखेज कौन नहीं बना रहा है…आप फिर भी वही देखते हैं…मॉल कल्चर का विरोध करते हैं और बगैर मॉल के आपका काम नहीं चलता। आप फेसबुक पर बलात्कार के आँकड़े भी दिखा देंगे….(जैसे कि हमने भी पेश किए) रेप और अपराध किसी पत्रकार के लिए अच्छी स्टोरी से ज्यादा कुछ नहीं है…कटु सत्य है। क्या बहिष्कार करने से अपराध रुकेंगे या अपनी बात रखने से रुकेंगे। महाभारत और रामायण की घटनाओं के पीछे रावण या दुर्योधन ही नहीं थे…अच्छे लोगों का मौन भी एक बड़ा कारण था…लालसा और बचपन से ही दुर्योधन के अहंकार को पालकर रखना उससे भी बड़ा पाप था। भारत की गुलामी का बड़ा कारण हमारा चारण काल रहा है जो सच को झूठ और झूठ को सच बनाते रहे…।
यह सही है कि बलात्कार को खत्म करने के लिए सख्त सजा का और फाँसी का होना जरूरी है। 2004 में जब धनंजय को फाँसी हुई थी…लड़कियों से बात की थी मैंने…सबको उम्मीद थी कि अब ऐसी घटनायें नहीं होंगी…मगर 2012 में फिर हुई..निर्भया कांड भी हुआ और पार्क स्ट्रीट कांड भी हुआ। कामदुनी कांड भी हुआ…फिर मोमबत्तियाँ गलायी गयीं…और एक बार फिर असम से लेकर गुजरात और जम्मू तक में एक ही कहानी दोहरायी जा रही है।

ये भी दैनिक जागरण की ही कटिंग है…

जब भी बात होती है तो कह दिया जाता है कि मानसिकता बदलनी जरूरी है मगर क्या इसके लिए जमीनी स्तर पर प्रयास करने पर आपका ध्यान दिया गया और सबसे बड़ी बात है कि अपने घरों को बदलने के लिए आपने कितने प्रयास किये…निचली जात के लोग…ऑटो व बस ड्राइवर….रिक्शा वाले…कहना बड़ा आसान है मगर उनका स्तर सुधारने के लिए साहित्यकार, लेखक, पत्रकार क्या कर रहे हैं…।  हम जीवन स्तर सुधारने की बात नहीं कर रहे है मगर वे जो अश्लीलता ढो रहे हैं और बसों में जो बजता है…उसे रोककर स्वस्थ मनोरंजन मुहैया करवाने की जिम्मेदारी आपने कब उठायी? किसी भी बहिष्कार से कभी भी कुछ नहीं सुलझता…आपके किनारा करने से सामने वाले को बहाना मिला…आप अगर 1 या 2 अखबार नहीं खरीदेंगे तो उनका कुछ नहीं बिगड़ने वाला मगर इस कार्यक्रम में जाकर अपना विरोध जताते और प्रबंधन को कठघरे में खड़ा करते तब कुछ जरूर बदलता।  अधिकतर साहित्यकार या तो प्रोफेसर हैं और या किसी बड़े पद पर हैं…निजी स्तर पर अपने आस – पास की दुनिया को सुधारने या फिर लड़कों को जागरुक करने के लिए आपने क्या किया…अधिकतर हिन्दी माध्यम स्कूलों में मैंने शिक्षकों को अरे …तरे वाली जुबान में बात करते देखा है…शिक्षिकाओं को उपेक्षित करते और तंज कसते देखा है और आप चाहते हैं कि दुनिया बदल दें। आप कॉलेज छोड़िए…अपने घरों में लड़कों और लड़कियों को सुधारने के लिए क्या किया…बेटियाँ कभी मंच पर नहीं आतीं और पत्नियाँ आपके आभा मंडल से आच्छादित है…आप घरों में हिंसा करते हैं..नयी लेखिकाओं के चयन में पक्षपात ढूंढते हैं…आप दुनिया बदलेंगे? ज्यादा दिन नहीं हुए जब एक प्रख्यात पुरस्कार को लेकर किसी दिग्गज लेखक के कटाक्ष का सामना…यहाँ तक कि संबंधों की छींटाकशी का शिकार हिन्दी की एक बड़ी कवियित्री को होना पड़ा था…भगवान के लिए बलात्कार को लेकर भाषण बंद कीजिए..आपने बच्ची को तमाशा बनाकर रख दिया। पत्रकार हूँ…पता है कि एक रिपोर्टर को किस दबाव में काम करना पड़ता है…मीडिया में अधिकतर मेरे मित्र हैं…कुछ जागरण या ऐसे किसी मीडिया संस्थान से हैं….मैं बहिष्कार – बहिष्कार का खेल नहीं खेल सकती क्योंकि रिपोर्टर तो आज मोहरा है…जिसके कंधे पर बंदूक रखकर मीडिया संस्थान अपना हित साधते हैं….अगर रिपोर्टर अड़ा है तो समझ लीजिए कि उसके कंधे पर भी बंदूक है….आदर्श की बातें करना आसान है मगर क्या एक ईमानदार पत्रकार के लिए भी लेखक क्या कभी सड़क पर उतरे हैं….हाल के दिनों में मेरे बहुत से साथियों ने मार खायी…बहुत से पत्रकारों की हत्या हुई..दिल्ली में महिला पत्रकार से बदसलूकी की गयी…मुझे बताइए कि कितने लेखक उतरे हैं उनके लिए…आप लेखकों की उपेक्षा का रोना रो रहे हैं…हम मर जाते हैं तो वो दो लाइनें भी तकदीर से नसीब होती हैं…हर कोई सुरेन्द्र प्रताप सिंह जैसी लोकप्रियता नहीं पाता। कल एक महिला पत्रकार को अलीपुर में घंटों रोककर रखा गया, उससे मारपीट की गयी…सिर्फ इसलिए कि वह विरोधी विचारधारा की थी और अपना काम कर रही थी।

इनको प्रचार चाहिए और हमको खबर….कैसे न दिखाएँ….मगर इनसे एक आम लड़की का कौन सा हित सधता है…

अब बात करते हैं मानसिकता की जो हमारे और आपके आस – पास पल रही है…लड़कियाँ किस तरह के माहौल से जूझ रही हैं….फेसबुक पर कई छात्र और छात्राएँ मेरी मित्र सूची में हैं…यह किस्सा इनमें से ही किसी एक बच्ची के साथ हुआ…लड़कियों के ऑनलाइन रहने से चरित्र की नापतौल होती है…’बच्ची ने फेसबुक पर पूछा कि अगर लड़की देर रात तक ऑनलाइन रहती है तो इसका क्या मतलब है…।’ एक जवाब देखिए….इसका दो मतलब है या तो सिंगल है या तो बहुत लोगो की गधा बना रही है….। दूसरा जवाब भी देखिए….पहला ये की वो अपने लवर के साथ बात कर रही और दूसरा ये की उसकी नीद खुल गयी हो और फिर लग नही रही हो तो वो ऐसे ही चेक कर रही हो। ये लड़के हमारे आस – पास ही रहने वाले हैं….एक ने लिखा कि वह 300 लड़कियों को जानता है और उनमें से कईयों के साथ रिलेशनशिप में रह चुका है…और यही आधार था उसके आकलन का…ये सारे बच्चे पढ़े – लिखे हैं….कॉलेजों में हैं….आप में से किसी न किसी से पढ़ते रहे हैं…बीएचयू में लड़कियों से बदसलूकी करने वाले आसमान से नहीं उतरे थे…और न ही वे विवादास्पद वीसी किसी और दुनिया से आये थे। प्रेसिडेंसी में कुछ साल पहले महिलाओं के अंतर्वस्त्र पहनकर एक छात्र ने विरोध किया तो जेयू में पूरे परिसर में सेनेटरी पैड लगा दिये गये…ये विरोध का कौन सा तरीका है?

पहली बात इस तरह का विरोध कितने मामलों में होता है और दूसरी बात….लड़कियों को इस हाल में लाने…के लिए क्या ये मोहतरमाएँ जिम्मेदार नहीं हैं…नो की शुरुआत तो इनको करनी चाहिए…आप काम के नाम पर कुछ भी कैसे कर सकती हैं…मतलब फोटो सेशन…

बात करते हैं मीडिया की…सुप्रीम कोर्ट के नियमानुसार और यूनिसेफ के चाइल्ड राइट्स चार्टर के अनुसार पीड़िता का नाम सामने नहीं आना चाहिए मगर आसिफा का नाम आया ही नहीं…पूरे फेसबुक पर बच्ची की छीछालेदर होती रही…अगर नाम सामने नहीं आता तो शायद हिन्दू – मुस्लिम का ब्लेम गेम चलता ही नहीं..मगर सबने नाम छापा। कठुआ गैंगरेप केस में दिल्ली हाईकोर्ट ने 12 मीडिया संस्थानों पर 10 लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। दरअसल, इन मीडिया संस्थानों पर बच्ची की पहचान उजागर करने को लेकर केस चल रहा था। कठुआ गैंगरेप पीड़िता का चेहरा और उसका नाम कुछ मीडिया संस्थानों ने उजागर कर दिया था। इनमें इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया, एनडीटीवी, द हिंदू जैसे बड़े मीडिया संस्थान शामिल थे। सहानुभूति जताने के बहाने दैनिक भास्कर जैसे अखबार जो विवरण देते हैं, वह बलात्कार से कम नहीं होता…हाल ही में टॉपलेस होने वाली अभिनेत्री की टॉपलेस का विरोध करने वाले इस अखबार ने छापी। अमर उजाला से लेकर जनसत्ता और यहाँ तक कि एन डी टी वी का यही हाल है,…कीजिए बहिष्कार…। बड़े – बड़े बुद्धिजीवी…भी नग्न तस्वीरें छापने वाले टाइम्स और टेलिग्राफ की ही बात करते हैं और शराब या हुक्के का विरोध करने पर उसे मोरल पुलिसिंग कहा जाता है….कितने लेखकों ने विरोध किया और कितनों ने बहिष्कार किया…?

इस तरह से आप अपराध की खबरें परोसते हैं…ये तो नमूना है…बस..हर दूसरी साइट पर आपको ऐसी तस्वीरें दिखेंगी

अब बात करते हैं नेताओं की….भाजपा के बयानवीर तो रोज नया कांड करते हैं। एक महोदय ने यहाँ तक कह डाला कि महिला पत्रकारों को खबरें हमबिस्तर होने के बाद मिलती हैं।….हमें नाराजगी हुई,…मगर इस बात में 10 फीसदी सच्चाई तो है कि पेज थ्री और कई बार स्टोरीज के लिए नयी लड़कियों को मजबूर तो होना पड़ता है….नौकरी बचाने के लिए…घर चलाने के लिए….अधिकतर लड़कियाँ जो घर से लड़कर अपनी राह बनाती हैं….उनके पास दूसरे विकल्प नहीं होते और जो बहुत ज्यादा महत्वाकाँक्षी होती हैं….उनके लिए शॉर्टकट ही चलता है…जो विद्रोही होती हैं…उनको कोई नहीं पूछता…आप लड़कियों को कहें तो क्या जो शोषण करता है और बच्चियों की मजबूरी का फायदा उठाता है…क्या वह पापी नहीं है….जो नेता ऐसा है…आप उसे तो दलाल नहीं कहते मगर लड़कियों को आपने वेश्या बना दिया….किसी ने मीडिया के भीतर चल रहे शोषण पर कलम चलायी है या कभी सोचा है कि स्ट्रींगर या सेवानिवृत्त पत्रकारों से लेकर कुछ हजार की नौकरी में घर खींच रहे पत्रकारों की जिन्दगी कैसे बीत रही है…खबरों को मरोड़ने का सिलसिला ऊपर से नीचे की ओर आता है…। कानून सिर्फ बलात्कार के लिए नहीं ऐसी विकृत मानसिकता से ग्रस्त बयानवीरों को रोकने के लिए भी होने चाहिए।

अभिषेक मल्होत्रा जी की वॉल से मैंने एक सच्चाई जानी थी…जो यहाँ भी साझा कर दे रही हूँ..एकदम जस का तस…..हॉट गैलरी में महिला पत्रकार!  एडीटर अटैक@प्रशांत राजावत की वॉल से उन्होंने साझा किया था। उसके अनुसार एक महिला पत्रकार से आज बात हो रही थी उन्होंने ताजा ताजा एक बड़े मीडिया समूह की न्यूज़ वेबसाइट ज्वाइन की है। उन्होंने बताया की उन्हें वेबसाइट के लिए हॉट गैलरी बनाने का जिम्मा दिया गया है। मैंने पूछा हॉट गैलरी क्या है तो बताया जिसमे अधनंगी, कम कपड़ों की, सेक्सी लड़कियां/औरतें हों और उनके बारे में मसालेदार खबरें।
बात यहीं खत्म नहीं होती ये महिला पत्रकार नई नई हैं तो हॉट गैलरी के लिए तस्वीरें ढूंढी,खबरें बनाई तो मुख्य एडीटर ने देखा तो बोला मैडम जी रामायण कालीन हेडिंग की जरूरत नहीं है बोल्ड हेडिंग लगाओ, बोले तो कैचिंग। एक मीडिया दफ़्तर जहां पत्रकारिता होती है वहां एक महिला पत्रकार से आप हॉट गैलरी बनवा रहे हैं वो गूगल में अधनंगी लड़कियों को खोजने में व्यस्त हो जाती है क्योंकि वो जानती है भारत में अधनंगी औरतें और उनके जिस्म बिकाऊ हैं और फिर यही महिला पत्रकार जो हमारी बहन, बेटियां हैं देर शाम दफ़्तर से निकलती हैं असुरक्षित महसूस करते हुए, लोगों की नजरों से बचते हुए, डरते हुए। क्यों क्योंकि ये जानती हैं हॉट गैलरी देखने के आदी हैं ये लोग, जिन्हें हमने ही आदी बनाया है हर रोज बनाते हैं और बनाकर आ रहे हैं।
मीडिया दफ़्तर का एडीटर जानता है हॉट गैलरी सबसे ज्यादा हिट पाती है पर वो ये क्यों नहीं जानता की हॉट गैलरी के आदी हो चुके लोग उसकी अपनी बेटी या बहन में भी सरे राह हॉट गैलरी ढूढ़ते होंगे। आप सम्पादक हैं, मानसिकता का अध्ययन किया है लोगों की तभी तो हॉट गैलरी और कैचिंग हेडिंग चाहिए। मुझे आश्चर्य है उस महिला पत्रकार के लिए की जो दफ़्तर में 8 घण्टे हॉट गैलरी तैयार करती है, अपनी ही कौम की महिलाओं के जिस्मो को ढूढ़ ढूंढकर एक तरह से परोसती ही है और फिर देर रात दफ़्तर के बाहर हॉट गैलरी के आदी हो चुके लोगों से खौफ़ खाती है। बचती है, असुरक्षित महसूस करती है।
हे ईश्वर ये कैसी दुनिया निर्मित हो रही है। एक लड़की खुद को ही तो परोस रही है, लड़की ही लड़कियों की कामुक, अश्लील, नंगी तस्वीरें खोज रही है बेचने के लिए। बस बदले में उसे हर माह तनख़्वाह मिलती है। तस्वीरें ऐसी ऐसी हैं इन प्रख्यात साइट्स में कि आप देख नहीं सकते परिवार के साथ। ये सबसे सामान्य है और गजब की बात देखिये इतने बड़े मीडिया समूह के सम्पादक को ये पता है की महिलाओं का जिस्म देखने की लत है लोगों में तो स्पेशल लिखा भी है पाएं ऐसी और तस्वीरें अगर मन न भरा हो।
फिर यही बड़ी बड़ी सम्पादकीय लिखते हैं। आपको क्यों लिखना पड़ रहा है की पाएं ऐसी और तस्वीरें, क्यों आपको लगता है ऐसी तस्वीरें लोग देखना चाहेंगे। आप तो बड़ी बड़ी सम्पादकीय लिखते हैं महिलाओं के पक्ष में कि कम कपड़े छेड़खानी और रेप के लिए उत्तरदायी नहीं तो कम कपड़ों की ऐसी ही और तस्वीर पाने के लिए व्यवस्था क्यों कर रहे हैं।
कम कपड़े की लड़की यहाँ देखी जा रही है और आप दिखवा रहे हैं तो निश्चित है मेट्रो, स्टेशन, कॉलेज हर जगह लोगों में दिलचस्पी होगी कम कपड़ों की लड़की को देखने में। आप मीडिया हैं आपने ही तो आदत डाली है। काम करना है तो जमीन में जाकर कीजिए वरना थोथे बहिष्कार का कोई मतलब नहीं।

विदेशों का किस्सा जानिए
अभी हाल ही में एक खबर आई थी कि पुतिन ने अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प को कहा था कि रूस की वेश्यायें सबसे अधिक सुन्दर होती हैं। ट्रम्प किस तरह के महिला विरोधी इन्सान हैं…सब जानते हैं। दो शक्तिशाली देशों के राष्ट्राध्यक्षों की बातचीत जब ऐसी होगी तो आप क्या उम्मीद कर रहे हैं और किससे कर रहे हैं कि वह महिलाओं के लिए और बच्चों केे लिए बात करेगा –

https://www.jansatta.com/international/james-comey-memos-about-america-president-donlad-trump-russia/636838/

पाकिस्तान में तो बहन को भाई के गुनाह की सजा गैंगरेप की अनुमति देकर इन्साफ पंचायतें करती हैं..https://www.thelallantop.com/news/pakistan-man-rapes-woman-victims-brother-raped-her-sister-in-return-with-the-consent-of-both-the-families/

मी टू या अब जो फेसबुक पर हो रहा है…मेरी नजर में इसने पूरे विरोध को फैशन बनाकर रख दिया है। रवीन्द्र सरणी -लाल बाजार क्रांसिंग पर आसिफा को न्याय दिलाने के लिए हम शर्मिंदा हैं…टाइप होर्डिंग्स लगी हैं और मुझे वो मध्यमग्राम की बच्ची याद आ रही है जिससे साथ न सिर्फ बलात्कार हुआ बल्कि शिकायत लिखवाने पर फिर वह बलात्कार की शिकार बनी और अंत में उसने खुद को आग लगाकर मुक्ति पा ली….उसके टैक्सी ड्राइवर पिता को आखिरकार बंगाल छोड़ना पड़ा….आप करते रहिए ….यत्र नायर्स्ते पूज्येंतु ….जब तक खुद कमान सम्भालकर सुधार नहीं लाने चलेंगे….कुछ नहीं होगा…कीजिए और नहीं हो सकता है तो ढोंग बंद कर दीजिए….।
कुछ समाधान तलाश रही थी…मन हो तो देख सकते हैं….

https://sushmakibatkahi.blogspot.in/2018/04/blog-post_13.html

(आँकड़े नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो और महिला पत्रकार का किस्सा…अभिषेक मल्होत्रा जी की फेसबुक वॉल से साभार)

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