भगवान शिव के त्रिशूल पर जो टिकी है…वह है काशी

वाराणसी जिसे बनारस या काशी भी कहा जाता है, एक प्रसिद्ध हिंदू तीर्थस्‍थल है। यह शहर गंगा नदी के तट पर उत्तर प्रदेश में स्थित है। यह विश्‍व का वैसा प्राचीनतम शहर है जहां प्राचीन काल से ही लोग लगातार निवास करते आ रहे हैं। इसका उल्‍लेख प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्‍वेद में भी मिलता है। इसे मंदिरों का शहर भी कहा जाता है। वाराणसी हजारों सालों से उत्तरी भारत का धर्म और संस्‍कृति का केंद्र रहा है। महाभारत में भी इसका जिक्र मिलता है क्योंकि भीष्म जिन तीन कन्याओं, अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका का हरण कर ले गये थे, वे तीनों राजकुमारियाँ काशी की ही थीं।
वाराणसी ने अपने ढ़ंग का शास्‍त्रीय ‘हिन्‍दुस्‍तानी संगीत’ वि‍कसित किया। इसने अनेक विशिष्‍ट दार्शनिक, कवि, ले‍खक तथा संगीतज्ञ पैदा किया है। कबीर, रविदास, मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, आचार्य रामचंद्र शुक्‍ल तथा उस्‍ताद बिस्मिल्‍लाह खान यहीं के थे। प्रसिद्व सितार वादक तथा बांसुरी वादक पंडित रविशंकर और हरिप्रसाद चौरसिया भी बनारस के ही रहने वाले है। इसके अलावा बनारस हिंदू विश्‍वविद्यालय भी यहीं है। तुलसीदास ने अपनी प्रसिद्ध पुस्‍तक रामचरितमानस की रचना यहीं की थी।

वाराणसी से संबंधित अनुश्रुतियां तथा पौराणिक क‍थाएं –
विश्‍वास किया जाता है कि गंगा नदी के तट पर बसे इस शहर को ही भगवान शिव ने पृथ्‍वी पर अपना स्‍थायी निवास बनाया था। यह भी माना जाता है कि काशी का निर्माण सृष्टि रचना के प्रारम्भिक चरण में ही हुआ था। यह शहर प्रथम ज्‍योर्तिलिंग का भी शहर है।

काशी विश्वनाथ मंदिर

पुराणों में काशी को ब्रह्मांड का केंद्र बताया गया है तथा यह भी कहा गया है यहां के कण-कण में शिव निवास करते हैं। वाराणसी के लोगों के अनुसार, ” काशी के कंकर में शिवशंकर हैं।” इनके कहने का अर्थ यह है कि यहां के प्रत्‍येक पत्‍थर में शिव का निवास है।
काशी को ‘महाश्‍मशान’ के नाम से भी जाना जाता है। इसे पृथ्‍वी का सबसे बड़ा शमशान भूमि माना जाता था। यहां के मर्णिकाघाट तथा हरिश्‍चंद्र घाट को सबसे पवित्र घाट माना जाता है।  प्राचीन काल में विश्‍वास किया जाता था कि यहां जिनका क्रिया कर्म किया जाता है उन्‍हें मोक्ष की प्राप्‍ित होती है। वाराणसी का एक अन्‍य नाम ‘अभिमुक्‍ता’ था। माना जाता है कि इस शहर को भगवान शिव अपने त्रिशूल पर उठाए हुए हैं।

धमोक स्तूप के पास एक बौद्ध मठ

काशी के रूप में वर्णित वाराणसी या बनारस शहर भारत की समृद्ध विरासत को अपने आप में संजोये हुए है। यह प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति, दर्शन, परंपराओं और आध्यात्मिक आचरण का एक आदर्श सम्मिलन केंद्र रहा है। यह सप्त पुरियों यथा प्राचीन भारत के सात पवित्र नगरों में से एक है। बनारस शहर गंगा नदी के किनारे पर स्थित है। गंगा की दो सहायक नदियाँ वरुणा और अस्सी के नाम पर इसका नाम वाराणसी हुआ। काशी- पवित्र शहर, गंगा- पवित्र नदी और शिव – सर्वोच्च भगवान, ये तीनों वाराणसी को एक विशिष्ट स्थान बना देते हैं। आज वाराणसी सांस्कृतिक और पवित्र गतिविधियों का केंद्र है।

श्री काशी विश्वनाथ मन्दिर
शहर के मुख्य देव भगवान शिव को समर्पितश्री काशी विश्वनाथ मंदिर एक प्रमुख पवित्र आकर्षण है। बारह ज्योतिर्लिंगों में सेएक शिवलिंग इस मंदिर में है। यह प्रकाश का अग्निमय स्तंभ है, जिसके द्वारा भगवान शिवने अपने दिव्य वर्चस्व को चिन्हित किया। ऐसा प्रतीत होता है मानो वे पृथ्वी की सतहको तोड़ कर स्वर्ग की ओर प्रकाश रूप में चमक रहे हैं। वर्तमान मंदिर इंदौर की रानीअहिल्याबाई होल्कर ने 1776 में बनाया था, हालांकि तत्कालीन समय से पहले भी श्री काशीविश्वनाथ मंदिर अस्तित्व में था। महाराजा रणजीत सिंह द्वारा शिखर को लगभग 800 किलोसोने से जड़वाया गया था, इसलिए इसे वाराणसी में स्वर्ण मंदिर के रूप में भी जाना जाताहै। पिछली शताब्दियों में मंदिर का कई बार पुनर्निर्माण हुआ है। वाराणसी का दूसरा नामपर इस मंदिर के नाम पर काशी है। इस तीर्थ का प्राचीन धार्मिक ग्रंथों जैसे स्कंद पुराणमें भी उल्लेख मिलता है। यहाँ का भक्तिपूर्ण माहौल प्रत्यक्ष रूप से अनुभव होता है।मंदिर की पवित्रता हजारों मील की यात्रा कर आने वाले तीर्थयात्रियों की भक्ति से औरबढ़ती प्रतीत होती है। यहां मंत्रों का जप होता है और घंटियाँ निरंतर बजती रहती है।प्राँगण के भीतर कई छोटे मठ हैं। यहां शिव के बैल नन्दी की एक 2.1 मीटर ऊँची प्रतिमाप्रतिष्ठापित है। वाराणसी की यात्रा के दौरान यहाँ की आरती सबसे ज्यादा प्रभावशालीअनुभवों में से एक है।

अस्सी घाट

ज्ञानवापी: विश्वनाथ मंदिर के बगल स्थित मस्जिद में श्रृंगारगौरी मां की मूर्ति है। मस्जिद के बाहर मंदिर परिसर में विशाल कुंआ है और उसके बाहर विशालकाय नंदी है जो मस्जिद की ओर देख रहा है। यहाँ कुएं का जल लोग प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।
काल भैरव: काल भैरव को काशी का कोतवाल कहा जाता है। बाबा विश्वनाथ से लगभग एक किमी दूरी पर यह मंदिर स्थित है।
दुर्गाकुंड: आदिशक्ति मां दुर्गा का यह मंदिर पवित्र सरोवर दुर्गाकुंड के किनारे है। मान्यता है कि यहां मां की मूर्ति को स्थापित नहीं किया गया था बल्कि स्वयं प्रकट हुई थी। नवरात्रि में यहां दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है।
तुलसी मानस मंदिर: दुर्गाकुंड के नजदीक ही सफेद संगमरमर से बना विशाल तुलसी मानस मंदिर है। भगवान राम को समर्पित इस मंदिर का निर्माण 1964 में हुआ था। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण उसी जगह पर किया गया है जहां पर बैठकर तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना की थी। मानस मंदिर की दीवारों पर रामचरित मानस की चैपाइयां लिखी है।
संकटमोचन मंदिर: मानस मंदिर से आधा किमी की दूरी पर स्थित संकटमोचन मंदिर हनुमान जी का प्राचीन मंदिर है। यहां साल में एक बार संगीत समारोह आयोजित होता जिसमें विख्यात कलाकार प्रस्तुति देते हैं।
भारतमाता मंदिर: कैंट स्टेशन से लगभग दो किमी दूर भारत माता को समर्पित यह एक अनोखा मंदिर है। 1936 में इस मंदिर का निर्माण बाबू शिव प्रसाद गुप्त ने करवाया था। मंदिर में अविभाजित भारत का नक्शा बना है। संगमरमर से बने इस नक्शे में, मैदान, नदियों, पहाड़ों और समुद्र को बहुत ही बारीकी से उकेरा गया है। इसके अलावा काशी कई छोटे-बड़े अन्य मंदिर भी हैं।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय

बनारस के घाट- बनारस शहर को चंद्राकार घेर हुए गांगा के छोटे-बड़े 84 घाट हैं। अस्सी घाट से लेकर राजघाट तक पैदल घूमने का अपना ही मजा है। अस्सी घाट के नजदीक ही महारानी लक्ष्मीबाई का जन्मस्थल है। आगे दसाश्वमेध घाट, मणिकर्णिका घाट, राजेंद्र प्रसाद घाट और भी । सुबह-शाम इन घाटों पर घूमने का अपना ही आनंद है।

बनारस के घाट पर बैठकर सूर्योदय देखना अपने आप में अद्भुद अनुभव है। फिर शाम को गंगा आरती। आध्यात्म और संगीत का अनुपम संगम। सूर्याेदय और गंगा आरती देखने के लिए प्रतिवर्ष लाखों लोग आते हैं।

रामनगर का किला

यहां नाव से भी आरती का आनंद लिया जा सकता है। यहीं बीच में है मणिकर्णिका घाट। जहां से गुजरते हुए बरबस संसार के सबसे बड़े सच से साक्षात्कार होता है। कहते हैं इस महाश्मशान में जिसका अंतिम संस्कार होता है उसे स्वर्ग में जगह मिलती है।
बनारस में चर्च और कई प्रसिद्ध मसि्जद भी हैं। हां, बनारस आएं है तो कबीर की जन्मस्थली, लहरतारा और रविदास मंदिर देखकर ही जाएं।
देव दीपावली : कार्तिक पूर्णिमा के दिन वाराणसी में देव दीपावली मनाई जाती है। यह उत्सव बहुत ही अद्भुत और दुर्लभ है। इस दिन शहर के सभी घाटों को मिट्टी के दीये जलाकर सजाया जाता है।

इस दृश्य को देखकर ऐसा लगता है कि मानों आकाश के सारे तारे बनारस के घाट पर उतरकर भगवान शिव की महाआरती कर रहे हैं।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय : वाराणसी को ‘सर्वविद्या की राजधनी’ कहा जाता है। महामना पंडित मदनमोहन मालवीय ने 1916 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की। 1300 एकड़ में फैला विश्वविद्यालय एशिया का सबसे बड़ा आवासीय विवि है।

इसके परिसर में स्थित नया विश्वनाथ मंदिर भी अच्छा दर्शनीय स्थल है। यह भव्य मंदिर परिसर की शान है। बनारस जाएं तो यहां जरूर जाएं। दुनिया भर में बीचएयू नाम से प्रसिद्ध इस विवि में देश सहित दुनिया के कई देशों के विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। बनारस में काशी विद्यापीठ, संपूर्णानंद संस्कृत विवि और सारनाथ में तिब्बत उच्च शिक्षण संस्थान भी है।

तुलसी मानस मंदिर

भारत कला भवन: काशी हिंदू विश्वविद्यालय परिसर में स्थित यह कला और शिल्प संग्रहालय विश्वभर में प्रसिद्ध है।

यहां 15वीं और 16वीं शताब्दी की कई शिल्पकारियां रखी हैं। इसके साथ ही मुगलकाल तथा अन्य राजाओं के शासन काल की पेंटिंगों का विशाल संग्रह है। इस संग्रहालय में पुराने सिक्कों का भी बहुत अच्छा संग्रह है।
आसपास
रामनगर किला: शहर से 14 किलोमीटर दूर गंगा के पूर्वी किनारे पर महाराजा काशी का किला है। इसका निर्माण महाराजा बलवंत सिंह ने करवाया था। लाल पत्थरों से निर्मित इस किले को संग्रहालय में बदलकर आम जनों के लिए खोल दिया गया है। इस संग्रहालय में राजसी ठाठबाट की तमाम चीजें गाडिय़ां, गहने, कपड़े आदि के अलावा अस्त्र-शस्त्र का विशाल संग्रह है। अपनी तरह का यह एशिया का सबसे बड़ा संग्रहालय है।
सारनाथ : बौद्ध धर्मावलम्बियों के लिए विशेष महत्व रखने वाला यह स्थल कई मायनों में महत्वपूर्ण है। भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना पहला उपदेश यहीं दिया था।
धमेक स्तूप: यह स्तूप सारनाथ की पहचान है। 43.6 मीटर लम्बा यह स्तूप ईंट और पत्थरों से बना हुआ है। इसमें भगवान बुद्ध के अस्थि अवशेष रखे गए हैं।
मूलगंध कुटी विहार: महात्मा बुद्ध का यह आधुनिक मंदिर महाबोधि सोसाइटी द्वारा बनवाया गया है। जिसमें भगवान बुद्ध की मनमोहक मूर्ति स्थापित है। कुछ पुराने मंदिर यहां जर्जर भी हो चुके हैं जिनका पुनरोद्धार कराया जा रहा है। यहां एक छोटा सा चिडिय़ा घर और पुराने अवशेष हैं।
सारनाथ संग्रहालय: इस संग्रहालय में भारत का राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह अशोक स्तंभ संरक्षित है। इसके अलावा यहां बुद्ध और बोध्सित्व की मूर्तिकला का विशाल और दुर्लभ संग्रह है।

(साभार – काशीयाना डॉट कॉम तथा उत्तर प्रदेश पर्यटन)

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