‘भारत के रत्न’ भूपेन दा… हिन्दी फिल्मों में घोली असमिया महक

कोई एक व्यक्ति अकेले क्या-क्या हो सकता है? गीतकार, संगीतकार, गायक, कवि, पत्रकार, अभिनेता, फिल्म-निर्देशक, पटकथा लेखक, चित्रकार, राजनेता। असम की संगीत-संस्कृति और फिल्मों को दुनियाभर में पहचान दिलाने वाले सबसे पुराने और शायद इकलौते कलाकार। ये सारे परिचय असम की मिट्टी से निकले भूपेन हजारिका के हैं। जो हिन्दी फिल्मों में असमिया खुशबू बिखेर गए।
भूपेन गाते कई भाषाओं में थे, लेकिन असम की संस्कृति, ब्रह्मपुत्र नदी, लोक परंपराओं और समसामयिक समस्याओं पर गीत और कविताएं वो अपनी भाषा असमिया में ही लिखते थे। भूपेन दा ने हिन्दी फिल्मों असमिया की महक घोली। ‘रुदाली’ फिल्म का प्रसिद्ध गीत ‘दिल हूम-हूम करे’ लोकप्रिय असमिया गीत ‘बूकु हूम-हूम करे’ के तर्ज पर बना था। भूपेन दा ने एक हजार से ज्यादा गीत और कविताएं लिखीं। लघुकथा, निबंध, यात्रा वृतांत और बाल कविताओं की 15 किताबें लिखीं।
बहुमुखी प्रतिभा के धनी भूपेन दा को 1977 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। 1993 में उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाजा गया। 2009 में असम रत्न और संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड मिला। 2011 में उन्हें पद्म भूषण से अलंकृत किया गया। उन्होंने फिल्म ‘गांधी टू हिटलर’ में बापू का पसंदीदा भजन ‘वैष्णव जन’ गाया था।
असमिया फिल्म ‘चमेली मेमसाहब’ के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। 1926 में असम के सादिया कस्बे में जन्में भूपेन दा ने 1942 में गुवाहाटी से 12वीं पास की। 1944 में बीएचयू से ग्रेजुएशन और 1946 में पॉलिटिकल साइंस में एमए किया। इसके बाद वे न्यूयॉर्क चले गए और कोलंबिया यूनिवर्सिटी से जनसंचार में पीएचडी की। भूपेन दा ने सियासत में भी हाथ आजमाया और 1967 से 72 तक असम में निर्दलीय विधायक रहे। 2004 में गुवाहाटी सीट से भाजपा के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़े लेकिन सफल नहीं हो सके।

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