महज अंकों के सहारे जीवन का युद्ध नहीं जीता जा सकता

ये दौर प्रतियोगिता का दौर है और गलाकाट प्रतियोगिता का दौर है जो कि परीक्षाओं से होकर गुजरती हैं। अधिक से अधिक प्रतिशत अंक देकर उदार बनने की होड़ हर बोर्ड में लगी है और सीआईएससीई के बाद सीबीएसई और राज्य के बोर्ड भी दबाव में आकर इसका अनुकरण कर रहे हैं। इससे झोली भर नम्बर तो मिल रहे हैं मगर व्यावहारिक स्तर पर प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रतिभा का आकलन जब उम्मीदों के अनुरूप न हो तो यही अवसाद का कारण भी बन रहा है। जैसा कि हम पहले भी कह चुके हैं कि माता – पिता के लिए बच्चों की शिक्षा और उनके अंक स्टेटस सिम्बल बन चुके हैं और इसके लिए वे अपने अधूरे सपनों को बच्चों पर इस कदर थोपते हैं कि बच्चों के सपने, उनकी चाह छिल जा रही है और नतीजा यह है कि उनको मौत जिन्दगी से अधिक आसान लग रही है। यहाँ तक कि सुसाइड नोट में भी बच्चों का अपराध बोध पीछा नहीं छोड़ता और ऐसी घटनाएँ देखकर एकबारगी सोचना पड़ जाता है कि क्या माता – पिता वाकई ममता और करुणा को धारण करते हैं? हर साल जाने कितने टॉपर आते हैं और साल भर की चमक के बाद गायब हो जाते हैं। मेरा अनुभव यह है कि अंकों की सफलता का जीवन की सफलता से कोई लेना – देना नहीं है बल्कि जिन बच्चों को स्वाभाविक जीवन मिलता है, उन्मुक्त वातावरण मिलता है, वे बैकबेंचर्स होकर भी सफल हो जाते हैं। यहाँ तक कि असमय स्कूल छोड़ने वालों ने भी सफलता के झंडे गाड़े हैं। अंकों के सहारे जीवन का युद्ध पूरा नहीं जीता जा सकता और न ही यह ज्ञान को परिभाषित करता है। अंक सूचना दे सकते हैं क्योंकि आज की परीक्षाओं में हर चीज ऑब्जेक्टिव है, वे विस्तृत वर्णन या चित्रण करना जानते ही नहीं हैं मगर व्यावहारिक जीवन में आपको इनकी जरूरत पड़ती है।

आपको समझाने और ब्योरा देने की कला आनी चाहिए क्योंकि यह कला, वाणिज्य और विज्ञान, तीनों ही क्षेत्रों में समान रूप से प्रभाव छोड़ता है और आवश्यक भी है इसलिए वर्णनात्मक प्रश्नों का होना बहुत आवश्यक है। मोबाइल और टेलिग्राम के युग में भी अपनी बात समझाने की कला का होना बेहद आवश्यक है। सिद्धांत रट देने से आप प्रभाव नहीं छोड़ सकते। बोर्ड के 99 प्रतिशत अंक भी तब काम नहीं आते। जिनको आप 30 या 40 प्रतिशत अंक के कारण दुत्कारते हैं, जिनका मजाक उड़ाते हैं, कई बार वे बच्चे आपसे आगे निकलने में सक्षम होते हैं। सोशल मीडिया इस बीमारी प्रदर्शन का एक और माध्यम बन गया है। मुझे लगता है कि कम अंक पाने वाले बच्चों को भी सराहा जाना चाहिए और उनको प्रोत्साहन और मार्गदर्शन देने की भी जरूरत है। कम से कम ऐसा करने से शैक्षणिक व सामाजिक पर्यावरण सुरक्षित रहेगा। बाकी पर्यावरण की सुरक्षा सिर्फ पेड़ लगाकर छोड़ने से सम्भव नहीं है बल्कि छोटी – छोटी आदतों में यह भाव शामिल करने की जरूरत है। इलेक्टॉनिक कचरा और सेनेटरी नैपकिनों के अतिरिक्त अन्य कचरे का प्रबंधन बहुत जरूरी है। बाकी पर्यावरण और समाज दोनों, सुरक्षित रहे…यह दायित्व हमारा ही है।

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