मेरी आदत हो तुम 

वसुन्धरा मिश्र

मेरी आदतों में तुम कैद हो
इल्जाम मुझ पर लगाया
प्यार की ये कैसी कशिश है कि
सिर्फ अपने कामों के लिए
मेरी आदतों से बंधे
नया नाम दे मुझे ही बांधने चले।
उठते – बैठते – सोते – जागते
सिर्फ तुम्हारी जरूरतों को पूरा कर
दरकिनार कर मुझे बहलाते रहे
नया नाम देकर खुश करते रहे
जब चाहे घर को भी छिनते रहे
आदत है प्यार से मारने की
धमकी देने की
ऐसी आदतें तो तुम्हारे लिए है
झेलना तो मुझे है
जिसकी आदत भीतर ही भीतर कहीं कचोटती है पर आदत तो आदत है

 

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