रंगों का है एक धार्मिक और आध्यात्मिक संसार

जरा सोचिए अगर रंग न होते….कैसी होती धरती और कैसा होता संसार…सब फीका। रंग सुन्दर हैं मगर वे सिर्फ सुन्दर नहीं है बल्कि उनका अपना एक अलग संसार है और हर एक रंग का अपना महत्व है और मतलब भी। एक रंग की जगह दूसरा रंग नहीं ले सकता….वैसे ही जैसे सूरज नीला अच्छा नहीं लगेगा और धरती बस लाल।  वैसे, इंद्रधनुष के सात रंगों को ही रंगों का जनक माना जाता है। ये सात रंग क्रमशः लाल, नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला तथा बैंगनी हैं। रंगों की उत्पत्ति का मुख्य स्त्रोत सूर्य है। सूर्य के प्रकाश में विभिन्न रंग मौजूद हैं। जिनके कारण ही इंद्रधनुष का जन्म होता है।

रंगों का धार्मिक महत्व: रंगों के विज्ञान को समझकर ही हमारे ऋषि-मुनियों ने धर्म में रंगों का समावेश किया है। पूजा के स्थान पर रंगोली बनाना रंगों के मनोविज्ञान को भी प्रदर्शित करता है। कुंकुम, हल्दी, अबीर, गुलाल, मेंहदी के रूप में पांच रंग हर पूजा में शामिल हैं। धर्म ध्वजाओं के रंग, तिलक के रंग, भगवान के वस्त्रों के रंग भी विशिष्ठ रखे जाते हैं। ताकि धर्म-कर्म के समय हम उन रंगों से प्रेरित हो सकें और हमारे अंदर उन रंगों के गुण आ सकें।

आध्यात्मिक महत्त्व: आध्यात्मिक क्षेत्र में रंगों को सर्वाधिक महत्त्व का वर्णन ‘थियोसोफिकल सोसायटी’ ने दिया है। सोसायटी के अनुसार, मानव शरीर के अतिरिक्त एक सूक्ष्म शरीर भी होता है, जो चारों तरफ़ अण्डाकृति चमकीले धुंध से घिरा रहता है। आध्यात्मिक दृष्टि से उत्पन्न होने से इस अण्डाकृति में विभिन्न रंग दृष्टिगोचर होते हैं, जिनके आधार पर किसी शरीर के विषय में विभिन्न प्रकार की जानकारी मिल सकती है।

वास्तु में महत्त्व: शुभ रंग भाग्योदय कारक होते हैं और अशुभ रंग भाग्य में कमी करते हैं। विभिन्न रंगों को वास्तु के विभिन्न तत्त्वों का प्रतीक माना जाता है। नीला रंग जल का, भूरा पृथ्वी का और लाल अग्नि का प्रतीक है।

 

(साभार – नयी दुनिया )

 

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