संवेदनहीन राजनीति की जद में बच्चे और शेल्टर होम्स

सुषमा त्रिपाठी
हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या यह है कि समस्या को कांड में तब्दील कर राजनीतिक हथियार बना लिया जाता है और नतीजा यह है कि लोग राजनीति में उलझ जाते हैं। समस्या पीछे छूट जाती है। यही हो रहा है मुज्जफरपुर के बाद देवरिया में। मुज्जफरपुर कांड पर सुप्रीम कोर्ट खुद तत्पर है, मामला सीबीआई के पास है। बिहार सरकार ने तय कर लिया है कि बाल सुधार गृहों का संचालन अब वह खुद करेगी। योगी आदित्यनाथ ने भी सीबीआई जाँच की बात कह दी है मगर शेल्टर होम कांड को राजनीति के वार से आप कैसे बचाने जा रहे हैं? सबसे खौफनाक बात है कि बच्चियों की तकलीफ भूलकर राजनीति संवेदनहीनता की हदें पार कर चुकी है और अपराधी बेशर्म हँसी हँस रहे हैं। इतनी हिम्मत बगैर प्रश्रय पाये तो आ नहीं सकती। ऐसा नहीं होता तो बिहार के सीएम नीतीश कुमार मंत्री मंजू वर्मा का इस्तीफा अब तक माँग चुके होते। अब जब कि सबूत भी सामने आ चुके हैं कि बिहार में समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा और बृजेश ठाकुर के बीच जनवरी से अब तक 17 बार फोन पर बातचीत हुई थी।

इतनी देर क्यों नीतीश जी?

मुजफ्फरपुर बालिका गृह स्कैंडल मामले में मुख्य आरोपी बृजेश ठाकुर के कॉल डिटेल से यह खुलासा हुआ है। मुजफ्फरपुर मामले को लेकर समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा पर इस्तीफे की तलवार लटक रही है। हालांकि सोमवार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भले ही कहा था कि किसी को अकारण जिम्मेदार ठहराकर इस्तीफ़ा कैसे लिया जा सकता है, लेकिन इसके साथ ही उन्होंने ये भी कहा था कि अगर कुछ भी साक्ष्य सामने आता है तो वो इस्तीफ़ा लेने में देर नहीं करेंगे। अब मुजफ्फरपुर मामले की जांच में लगे अधिकारियों को प्रारंभिक छानबीन में पता लगा है कि मंजू वर्मा के पति चंद्रेश्वर वर्मा मामले में मुख्य अभियुक्त बृजेश ठाकुर के सम्पर्क में थे। बृजेश ठाकुर के फोन की कॉल डिटेल से यह जानकारी सामने आई है। ऐसी स्थिति में सीएम किस बात का इन्तजार कर रहे हैं। हैरत की बात यह है कि कांड में मामला दर्ज होने के बाद भी ब्रजेश ठाकुर को सरकारी विज्ञापन मिल रहे हैं। कोई जानने की कोशिश नहीं कर रहा कि आखिर बिहार के मुजफ्फरपुर स्थित एक बालिका गृह यौन शोषण मामले का मुख्य आरोपी ब्रजेश ठाकुर हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू में प्रकाशित होने वाले तीन अखबारों का मालिक भी है। उस पर इन अखबारों की कुछ प्रतियां छपवाकर उस पर बड़ा-बड़ा सरकारी विज्ञापन पाने में कामयाब होने के आरोप हैं।

मंजू वर्मा को क्यों बचाया जा रहा है

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार ब्रजेश तीन अखबारों मुजफ्फरपुर से प्रकाशित एक हिंदी दैनिक समाचार पत्र प्रात: कमल, पटना से प्रकाशित एक अंग्रेजी अखबार न्यूज नेक्स्ट और समस्तीपुर जिला से उर्दू में प्रकाशित एक अखबार हालात-ए-बिहार से प्रत्यक्ष या परोक्ष से जुड़ा हुआ है। ब्रजेश को प्रात: कमल के विशेष संवाददाता के रूप में भी सूचीबद्ध किया गया है। उसके पुत्र राहुल आनंद न्यूज नेक्स्ट के संवाददाता और हालात-ए-बिहार के संवाददाता के रूप में एक शाईस्ता परवीन तथा संपादक के रूप में रामशंकर सिंह का नाम दर्शाया गया है। ब्रजेश को पीआईबी और राज्य सूचना एवं जनसंपर्क विभाग (आईपीआरडी) दोनों से मान्यता प्राप्त पत्रकार का दर्जा प्राप्त था, जो कि उनके खिलाफ मामला दर्ज होने के बाद उनकी मान्यता दोनों जगहों से रद्द कर दी गयी। आईपीआरडी सूत्रों ने बताया कि उत्तर बिहार से जुड़ी परियोजनाओं का सरकारी विज्ञापन प्रात: कमल अखबार का प्रकाशन शुरू होने के समय से प्रकाशित हो रहा है। मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि ब्रजेश के स्वामित्व वाले हिंदी दैनिक की 300 से अधिक प्रतियां प्रकाशित नहीं होती हैं, लेकिन प्रतिदिन इसके 60,862 प्रतियां बिक्री दिखाया गया था, जिसके आधार पर उसे बिहार सरकार से प्रति वर्ष करीब 30 लाख रुपये के विज्ञापन मिलते थे।

क्या मेनका के इस बयान के बाद सांसद गम्भीर होंगे

आखिर ये कैसे सम्भव हो पा रहा है? सबसे बड़ी बात क्या बच्चे और वंचित बच्चे आपकी प्राथमिकता सूची में हैं? क्या आप वाकई इस मसले को लेकर गम्भीर हैं? क्या सांसद अपनी जिम्मेदारी निभा पा रहे हैं या उन्होंने राई रक्ती भर भी कोशिश की है। खुद देश की महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गाँधी को कहना पड़ रहा है कि उनको समय से रिपोर्ट ही नहीं मिल रही है। उनका मानना है कि अगर जाँच करवायी जाये तो ऐसे कई मामले सामने आयेंगे और हम सब जानते हैं कि यह सही है। मुजफ्फरपुर और देवरिया में फर्क सिर्फ इतना है कि ये दो अलग अलग राज्यों में हैं। मुजफ्फरपपुर मामले का मुख्य गुनहगार हवालात में है तो देवरिया शेल्टर होम केस में यूपी सरकार ने तत्काल कार्रवाई करते हुए जिलाधिकारी को हटा दिया है। केन्द्रीय मंत्री मेनका गांधी ने कहा कि ये न सिर्फ भयावह है, बल्कि इस तरह की घटनाओं के सामने आने के बाद दुख होता है। उन्हें पता है कि इस तरह की बहुत सी घटनाएं होती होंगी लेकिन हमने उन संस्थाओं को पैसे देने के अलावा ध्यान नहीं दिया। इस तरह के घृणित अपराध को रोकने के लिए हमें पुख्ता कदम उठाने ही होंगे। मेनका गांधी ने कहा कि वो सांसदों के सामने प्रस्ताव रखती हैं कि वो अपने संसदीय क्षेत्र में जाकर इस संबंध में जानकारी जुटा कर उन्हें रिपोर्ट दें। सांसदों द्वारा प्राप्त रिपोर्ट के बाद वो तत्काल कार्रवाई करेंगी। उन्होंने कहा कि कुछ सफेदपोश लोग इस तरह के काले कारनामों को अंजाम दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह की समस्या से निजात पाने के लिए एक हजार औरतों और एक हजार बच्चों के लिए बड़े शेल्टर होम को बनाने की जरूरत है। हमें छोटे छोटे सेंटर्स के गठन से बचना होगा। उनका मंत्रालय बड़े सेंटर्स के गठन के लिए धन मुहैया कराएगा। आप सोशल मीडिया पर भी इसे बड़े भयावह तरीके से पेश करते हैं और बच्चों पर हो रहे अपराधों के प्रति तो बिल्कुल संवेदनशील नहीं हैं। पीड़िता की तस्वीरें और जबरन उनका इंटरव्यू लेकर अपने चैनल की टीआरपी बढ़ाना एक भद्दे मजाक के अलावा कुछ नहीं हो सकता। कठुआ मामले में भी मीडिया हाउसों को चेतावनी मिली थी। कोई ऐसी ठोस प्रणाली नहीं है जो ऐसे शेल्टर होम्स की निगरानी करे। हम यहाँ सिर्फ बिहार, यूपी या किसी खास राज्य की बात इसलिए नहीं कर रहे क्योंकि सारे देश में हालात ऐसे हैं, आप कितनी घटनायें सामने रखेंगे?

जनता ही कुछ कर सकती है

हैरानी है कि तमाम कानूनों, एजेंसियों, बाल सुधार अभियानों, संस्थाओं और आयोगों के अलावा पुलिस और सरकार की विशाल मशीनरी हाथ पर हाथ धरे ही बैठी रहती, अगर टाटा इन्स्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस (टिस) के छात्रों का एक अध्ययन दल बिहार न पहुंचता और वहाँ बाल संरक्षण में काम कर रहे एनजीओ की सोशल ऑडिट न करता। पिछले साल अगस्त में नीतिश कुमार सरकार ने ये काम टिस को सौंपा था। इस साल अप्रैल में टिस अध्ययन दल ने जो रिपोर्ट बिहार सरकार को सौंपी उसमें छह शॉर्ट स्टे होम्स में और 14 शेल्टरों में बाल यौन उत्पीड़न के मामले बताए गए थे।
बिहार सरकार एनजीओ की मदद से 110 शेल्टर होम या संरक्षण गृह चलाती है। उत्तर प्रदेश के देवरिया में भी ऐसा ही एक संरक्षण गृह सामने आया जो एक दंपत्ति चला रहा था। वहां से भी 24 लड़कियों को छुड़ाया गया और तीन लोगों की गिरफ्तारी हुई है. कुछ समय पहले झारखंड के रांची में मिशनरीज़ ऑफ चेरेटी की दो ननों पर बच्चा चोरी का आरोप लगा था।
दुनिया की कुल बाल आबादी में 19 फीसदी बच्चे भारत में हैं. देश की एक तिहाई आबादी में, 18 साल से कम उम्र के करीब 44 करोड़ बच्चे हैं। सरकार के ही एक आकलन के मुताबिक 17 करोड़ यानी करीब 40 प्रतिशत बच्चे अनाश्रित, वलनरेबल हैं जो विपरीत हालात में किसी तरह बसर कर रहे हैं। सामाजिक-आर्थिक और भौगोलिक तौर पर वंचित और उत्पीड़ित बच्चों के अधिकारों की बहाली और उनके जीवन, शिक्षा, खानपान और रहन-सहन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। महिला और बाल कल्याण के लिए 1966 में बना राष्ट्रीय जन सहयोग और बाल विकास संस्थान, एनआईपीसीसीडी बच्चों और महिलाओं के समग्र विकास के लिए काम करता है. बच्चों पर केंद्रित राष्ट्रीय बाल नीति, 2013 में अस्तित्व में आ पाई। बच्चों पर यौन अपराधों को रोकने के लिए पोक्सो कानून 2012 में लाया गया. 2014 में जुवेनाइल जस्टिस (केयर ऐंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन) बिल लाया गया। जेजे एक्ट 2000 में बना था, 2006 और 2011 में दो बार इसमे संशोधन किए गए। जहां तक बाल कल्याण नीतियों की बात है तो समन्वित बाल सुरक्षा योजना, आईसीपीएस चलाई जा रही है। जिसका आखिरी आंकड़ा 2014 तक का है जिसके मुताबिक 317 स्पेशलाइज्ड एडॉप्शन एजेंसियां (एसएए) और अलग अलग तरह के 1501 होम्स के लिए 329 करोड़ रुपए आवंटित किए गए और 91,769 बच्चों को इनका लाभ प्राप्त हुआ। आईसीपीएस के तहत ही देश के ढाई सौ से ज्यादा जिलों में चाइल्डलाइन सेवाएं चलाई जा रही हैं। बच्चों के उत्पीड़न और उनकी मुश्किलों का हल करने का दावा इस सेवा के माध्यम से किया जा रहा है लेकिन लगता नहीं कि मुजफ्फरपुर या देवरिया में बच्चियों की चीखें इन चाइल्डलाइन्स तक पहुँच पाई हों।

आखिर यह हँसी किसके दम पर है

2007 में विधायी संस्था के रूप में गठित, नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (एनसीपीसीआर) के एक आंकड़े के मुताबिक भारत में इस समय 1300 गैरपंजीकृत चाइल्ड केयर संस्थान (सीसीआई) हैं यानी वे जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत रजिस्टर नहीं किए गए हैं। देश में कुल 5850 सीसीआई हैं. और कुल संख्या 8000 के पार बताई जाती है। इस डाटा के मुताबिक सभी सीसीआई में करीब दो लाख तैंतीस हजार बच्चे रखे गए हैं। पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने देश में चलाए जा रहे समस्त सीसीआई को रजिस्टर करा लेने का आदेश दिया था. लेकिन सवाल पंजीकरण का ही नहीं है. पंजीकृत तो कोई एनजीओ करा ही लेगा क्योंकि उसे फंड या ग्रांट भी लेना है, लेकिन कोई पंजीकृत संस्था कैसा काम कर रही है इसपर निरंतर निगरानी और नियंत्रण की व्यवस्था तो रखनी ही होगी. डिजीटलाइजेशन पर जोर के बावजूद सरकार अपने संस्थानों और अपने संरक्षण में चल रहे संस्थानों की कार्यप्रणाली और कार्यक्षमता की निगरानी का कोई अचूक सिस्टम विकसित नहीं कर पा रही है।
बंगाल की स्थिति कुछ अलग नहीं है। यहाँ भी ऐसे मामले सामने आये हैं मगर यहाँ भी राजनीति ने मुद्दे को दबा रखा है।
अब शेल्टर होम्स को लेकर एक इत्मिनान रखने वाला रवैया छोड़ देना चाहिए क्योंकि दक्षिण 24 परगना में शिशुओं की खरीद-फरोख्त का मामला बहुत पुराना नहीं हुआ है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इसमें बड़े-बड़े नाम सामने आये थे। वहीं एनसीआरबी की हालिया रिपोर्ट कहती है कि देश भर में बच्चों के खिलाफ होने वाले आपराधिक मामलों में 12,786 की वृद्धि हुई है। 2015 में आँकड़ा जहाँ 94,172 था, वहीं आँकड़ा 2016 में 1,06,958 हो गया। वहीं बच्चों के लिए काम कर रही संस्था क्राई के मुताबिक पिछले एक दशक में यह आँकड़ा 500 गुना बढ़ चुका है। बिहार के बाल सुधार गृह का मामला तो बानगी भर है। बच्चों के खिलाफ सबसे अधिक अपराध उत्तर प्रदेश (15 प्रतिशत), महाराष्ट्र (14 प्रतिशत), मध्य प्रदेश (13 प्रतिशत), दिल्ली और पश्‍चिम बंगाल में हुए और इन 5 राज्यों में ही 50 प्रतिशत मामले दर्ज किये गये हैं। अब तक आप अपहरण से परेशान थे मगर सबसे चिन्ताजनक बात यह है कि बच्चों से होने वाले दुष्कर्म के आँकड़े 18 प्रतिशत बढ़ चुके हैं। एनसीआरबी का हालिया जो आँकड़ा है वह बताता है कि लापता बच्चों को लेकर सबसे अधिक मामले पश्‍चिम बंगाल में सामने आये जिसका प्रतिशत 15.1 प्रतिशत है मगर वर्ष के अन्त तक 55, 944 बच्चों का पता लगाया गया था। राज्य की महिला एवं बाल विकास मंत्री डॉ. शशि पाँजा ने एक कार्यक्रम में पूछे जाने पर कहा था कि शिकायत अधिक दर्ज होने के कारण संख्या बढ़ी है। इसके अतिरिक्त कई बार ये बच्चे बांग्लादेशी होते हैं और भाषायी समानता होने के कारण इनको बंगाली समझ लिया जाता है।

बच्चे नहीं बचेंगे तो भविष्य भी नहीं बचेगा

यह बात अपनी जगह है मगर क्या इतने भर से हम आश्‍वस्त हो सकते हैं? पिछले साल ही राज्य के कई होम्स में शिशुओं की तस्करी और 10 से अधिक बच्चों की खरीद-फरोख्त का जो मामला सामने आया था, उसमें कारा (सेन्ट्रल एडप्शन रिसोर्स अथॉरिटी) में अनियमितताओं के आरोप लगे थे। शिशु तस्करी का मामला दक्षिण 24 परगना या उत्तर 24 परगना ही नहीं बल्कि उत्तर बंगाल तक जा पहुँचा था। अभी भी यह मामला बंद नहीं हुआ है। इसके पहले नवम्बर 2016 में उत्तर 24 परगना के बादुरिया और मानसिक जरूरतमंदों के ठाकुरपुकुर स्थित होम से 12 बच्चों को पुलिस ने बचाया था। इसके पहले हुगली के गुड़ाप में शेल्टर होम में भी उत्पीड़न का मामला सामने आया था। अगर हम वाकई अपनी समस्याओं को लेकर गम्भीर हैं तो जरूरी है कि राजनीति को इससे दूर करें, वरना आँकड़ों को लेकर रोने का कोई मतलब नहीं है। शेल्टर होम्स पर निगरानी बढ़ाइए और जनप्रतिनिधियों को रिपोर्ट देने के लिए बाध्य कीजिए। सरकारों को निजी संस्थाओं पर अपनी निर्भरता कम करके अपना तंत्र मजबूत कर सख्त कदम उठाने होंगे और उससे भी जरूरी है कि हम खुद सक्रिय हों क्योंकि आखिरकार सरकारें आती और जाती रहेंगी…ये बच्चे हमारे हैं, हमारे देश की तकदीर हैं जिसे हम यूँ ही नहीं छोड़ सकते।

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