स्त्रियों की अन्तर्कथा : ‘अंतराल’

राहुल गौड़

पूजा की छुट्टी से ठीक एक दिन पहले लेखिका द्वारा भेंट स्वरूप प्राप्त इस पुस्तक के शीर्षक ने मुझे सबसे पहले आकृष्ट किया है। कहानी संग्रह का नाम है ‘अन्तराल’। यह डॉ. शुभ्रा उपाध्याय का पहली कहानी संग्रह है। इसके अलावा विविध पत्र-पत्रिकाओं में इनकी कहानियां प्रकाशित होती रही हैं। कुल चौदह कहानियों के इस संग्रह से गुजरते हुए मैंने पुस्तक के साथ शीर्षक का तालमेल बैठाने की कोशिश की। वस्तुतः यह शीर्षक स्त्री जीवन के उन क्षणों का परिणाम है जब वह अपने अस्तित्व को लेकर चिंतनशील होती हैं। हमारे भारतीय समाज में स्त्री चाहे वह विवाहित हो या अविवाहित, अपने व्यक्तिगत स्वार्थ और लाभ से परे पारिवारिक सदस्यों की सहायता या सहयोग में ही अपनी सार्थकता स्वीकारती है। घर और बाहर की परिस्थितियों में वह अपने विवेक से सदा संतुलन बनाए रखती है। इसके लिए उन्हें पितृसत्तात्मक समाज में निरंतर प्रताड़ित और शोषण का शिकार होना पड़ता है । एक स्त्री को ही प्रायः अपने अहं से समझौता करना पड़ता है । आवरण पृष्ठ पर मुद्रित प्रस्तावना में कलकत्ता विश्वविद्यालय की पूर्व प्रो. चन्द्रकला पाण्डेय ने लिखा है-“संग्रह की कहानियां अधिकांश स्त्रियों के मानस में घटित होने वाली व्याकुलताओं को व्यंजित करती हैं। स्त्री पात्र अपने स्त्री होने की परिणति को झेल रहे हैं। ये वे स्त्रियां हैं जो लगातार लड़ रही है, जूझ रही है अपनी निष्ठा को सच्चा व पवित्र सिद्ध करने के लिये हर पल हर घड़ी तत्पर खड़ी हैं।” अतः शुभ्रा उपाध्याय की ये कहानियां स्त्री चेतना के उस उधेड़बुन को अभिव्यक्त करने में समर्थ हैं जो एक स्त्री के विविध क्रियाकलापों के अंतराल में चल रही है।
इस कहानी संग्रह की कुल चौदह कहानियां (क्रमश: अहर्निश, घूँघट, प्यासी धरती, तपिश, काश….,पहली कविता, अटूट बंधन, पंछियों का एक जोड़ा, अंगू की माँ, आइना, सोलह साल की बेटी, कहानी का प्लाट, कासे कहूँ….? और बारिश) समाज की विडम्बनापूर्ण अवस्था में स्त्रियों के अस्मिता की खोज है। इस संग्रह की पहली कहानी ‘अहर्निश’ में लेखिका ने प्रियंका और उसके माँ के माध्यम से माँ और पुत्री के बीच आदरपूर्ण संबंध को दर्शाया है। जहाँ एक तरफ माँ अपनी समस्त समस्याओं और आतंरिक व्यकुलताओं को अपने हृदय में सहेजे है वहीं दूसरी तरफ प्रियंका अपने प्रेम के मिठास और आदरपूर्ण क्रियाकलापों से अपने माँ की मुस्कान बनाये रखना चाहती है। वह अपनी माँ को उसके पुत्र के बिछोह से उपजे अवसाद से बचाने के लिए अहर्निश (हर पल) तत्पर है। वह अपने समय का उपयोग पिता और भाई के गैरमौजूदगी को पाटने के लिए अत्यंत ही कलात्मक ढंग से करती हैं। यह कहानी निर्मल अनुभूतियों के कोमलता को लिए हुए है ।
‘घूँघट’ शीर्षक कहानी ग्रामीण युवती के निर्भरता और समाज के खोखले सिद्धान्तों को उद्घाटित करने वाली कहानी है। यह कहानी एक ओर तो समाज के निर्ममता को दर्शाती है तो दूसरी ओर रक्त-सम्बन्ध से जुड़े पुत्र के स्वार्थ को भी दर्शाता है । हम एक ऐसे संकटमय दौर में है जहाँ प्रेम और समर्पण जैसे शब्दो का गलाघोंट दिया गया है और हम संवादहीनता के दौर से गुजर रहे हैं । हमारे समाज में लोग एक-दूसरे के हर्ष-विषाद बाँटने के स्थान पर परस्पर मॉब लिंचिंग द्वारा परिचालित हो रहे हैं। एक ऐसी विघटनकारी स्थिति जन्म ले चुकी हैं जो केवल मौन या नीरवता को ही प्रधानता देती है । कपट के शोर में मानवीय संवेदनाएं दम तोड़ रही हैं । कहानी की प्रमुख पात्र एक ऐसी अबला युवती है जिसका जन्म ही मानों वेदनाओं को सहने के लिए हुआ है। वह अपनी इस वेदनानुभूति को अभिव्यक्त करना चाहती है पर उसे सुनने वाला कोई नहीं । लेखिका ने इस कहानी में लिखा है-“वह (औरत) तो जैसे बनी ही इसी हेतु होती है। वेदनाओं के सुहाग का लाल टीका उसकी निरंतर जर्जर होती खोखली मन:स्थिति का हँस-हँस कर मजाक उडाता है, किन्तु वह धीर गम्भीर शास्त्रों के नारीत्व का ख्याल किए चुपचाप नीलकंठ बनी हमेशा गरल पान किया करती है। उसे तो अपने अमृत पुत्रों के समक्ष इतना भी अधिकार नहीं है कि अपने विषैले कंठ की करुण पुकार तक सुना सके।” ऐसे स्त्री की कोई व्यक्ति यदि सहायता भी करना चाहता है तो समाज के खोखले सिद्धान्तों का हवाला देकर उसे पुनः प्रताड़ित किया जाता है। उसके प्रति संवेदना व्यक्त करने वाले व्यक्ति पर भी तरह -तरह के लांछन लगाए जाते हैं। जिसके अस्तित्व से इस संसार की संरचना हुई है उसी के प्रति समाज का नजरिया बिल्कुल ही निर्मम और कठोर है। कहानी के अंत में लेखिका एक ऐसे परिवेश की परिकल्पना करती है जो स्त्री हृदय के समान ही कोमल और संवेदनशील है।
तीसरी कहानी ‘प्यासी धरती’ में गाँव की खेतीबारी का पारंपरिक स्वरुप वर्णित है। गाँव अमूमन पिछड़े प्रदेश को कहा जाता है परन्तु पुरखों द्वारा दी गई सांस्कृतिक एवं पारम्परिक सीख से समृद्ध गाँव सम्पूर्ण विश्व के लिए खाद्य उपजाता है। जहाँ लड़कियों को सपने देखने की तो आजादी है पर उसे पूरा करने की नहीं। अपने कर्त्तव्य के प्रति निष्ठावान औरत रात के अँधेरे में घुटनो के बल हल खिंचने के लिए भी तैयार है। कहानी में ग्रामीण औरतो के लोकगीत का प्रयोग कर लेखिका ने कहानी को जीवंत बना दिया है –
“बंसवा की कोठिया लुकाने मिया बरखु!
झुलनी पसवने न बूडे मिया बरखू!”
चौथी कहानी ‘तपिश’ में दाम्पत्य जीवन में संदेह और विश्वास के तानेबाने को बहुत ही कलात्मक ढंग से लेखिका ने प्रस्तुत किया है। प्रिया अपने पति परेश को संदेह की निगाहों से देखती है परन्तु उसका विश्वास संदेह पर बार-बार भारी पड़ता है। वह तो अपने पति की सहचारिणी बन कर रहना चाहती है। उसके साथ मिल कर सृजन के गीत गाना चाहती है – “सोचती हूँ कुछ विलक्षण रचूँ! कुछ ऐसा, जिसकी अमरता को निहारूँ मुग्ध होकर !….. मंथन गति में जीवन का लय सहशक्ति में सृजन का गीत!” नायिका जिस ‘सहशक्ति में सृजन का गीत’ की बात कर रही है वह एकाकी सम्भव नहीं है। वह स्वयं को आसमान में उड़ते परिंदे के समान समझती है। यदि परेश उसका साथ दे दे तो उसके थके हुए पंखों में पुनः ऊर्जा का संचार हो जाएगा।
पांचवीं कहानी ‘काश…’ है। जैसा कि शीर्षक से स्पष्ट है कि कहानी किसी व्यक्ति के उस लालसा की है जिसे वह पूर्ण नहीं कर पाया। किसी भी वस्तु का महत्व उसके न होने पर ही समझ आता है। इस कहानी में नायिका बूढ़ी मीना के प्रति सहानुभूति महसूस करती है। मीना अपने सैनिक बेटे और बहु द्वारा प्रताड़ित होती है और नायिका (बच्ची) को ही सबकुछ मानती है। उसकी यह उत्कट आकांक्षा थी कि उसके हाथ की बनी चाय बच्ची उसके घर में पिये। परन्तु नायिका के ऊँचे कुल का संस्कार उसे ऐसा करने से मना करता है क्योंकि मीना जाति से हरिजन है। गाँव से दूर प्रदेश में नायिका को जब भी यह संस्मरण याद आता है तो उसे बहुत पछतावा होता है। मीना अब इस दुनिया में नहीं थी और उसकी एक मात्र आकांक्षा भी अपूर्ण रह गई। लेखिका ने दोनों पात्रों का चरित्रांकन बड़े ही मनोवैज्ञानिक ढंग से किया है।
छठीं कहानी ‘पहली कविता’ एक अनचाहा, अनसमझे प्रेम की कहानी है। एक बिल्कुल ही सामान्य से मुलाकात में भी जीवन भर का साथी मिल सकता है। इस कहानी में नायिका के ऊपर नियति के वार और ऐसे संकट के समय में डॉ. प्रशांत के द्वारा किये गए सहायता को अत्यंत ही मार्मिकता के साथ प्रस्तुत किया गया है । यह वस्तुतः सहायता नहीं बल्कि साथ है जो दोनों एक-दूसरे के लिए निभा रहे थे । कथानक के साथ कहानी का शिल्प भी बेजोड़ है । चाय पीते-पीते नायिका फ्लेश-बैक में चली जाती है । जीवन की खट्टी-मीठी और साथ ही हृदयविदारक दृश्यों को प्रतिबिंबित कर वह पुनः वापस लौट आती है । नायिक और डॉ. प्रशांत के साथ होने की वजह को रेखांकित करने वाली यह कहानी अपने शैलीगत सौंदर्य के कारण और भी प्रभावकारी बन पड़ा है ।
सातवीं कहानी ‘अटूट बन्धन’ बदलते परिवेश में नैतिक सीख देने वाली विलक्षण कहानी है। आठवें कहानी ‘पक्षियों का जोड़ा’ में लेखिका ने साम्प्रदायिक उन्माद को अभिव्यक्त किया है । प्रमुख पात्र मानस देश का सिपाही है, जिसके कंधे पर सम्पूर्ण राष्ट्र की सुरक्षा है । वह अपने परिवार को दंगों के आग में झुलसने से नहीं बचा सका । उसकी माँ की ख्वाहिश थी – “मैं भी शहीद भगत सिंह की माँ कहलाऊँ! मैं भी चंद्रशेखर आजाद की जननी बनूँ!” भगत सिंह और चंद्रशेखर की माँ में एक समानता थी कि उन दोनों ने अपने बेटों को देश पर न्योछावर होते देखा था । परंतु मानस की माँ यह दिन देखने से पहले ही धार्मिक विद्वेष की बलि चढ़ गई । उसकी माँ के साथ उसके बीवी और एकलौता बेटा अमित भी खूनी वहशियों का शिकार हो गया । आश्चर्य की बात है कि एक परिवार के लगभग सभी लोग धार्मिक कट्टरता से लहुलूहान हो ईश्वर को प्राप्त हो गए हैं, उनका शव चहारदीवारी में कैद है परंतु उन्हें देखने के लिए कोई पड़ोसी नहीं आता । आज हमारे समाज में लोग बिल्कुल ही स्वार्थकेंद्रित और कठोर हो गए हैं । मानस अपने सम्पूर्ण परिवार को घर के आंगन में ही अग्नि को समर्पित करता है । बाद में तिलमिला कर अपने बंदूक से हवा में दो गोलियां दागता है। इससे और कुछ नहीं पर पक्षियों का एक जोड़ा शिकार हो जाता है । गाँधी जी ने कहा था “आँख के बदले आँख, पूरे देश को अँधा कर देगा।” प्रतिशोध और हिंसा-प्रतिहिंसा की ज्वाला में मासूम पक्षियो के जोड़े, इसी प्रकार तबाह होते रहेंगे । अतः यह कहानी हमे यह संदेश देती है कि हिंसा व्यर्थ है। इससे और कुछ नही बल्कि मासूम लोगों की जाने जाती हैं।
नौवीं कहानी ‘अंगू की माँ’ में एक गृहणी के गृहस्थ जीवन के मनोरंजक पहलुओं को उद्घाटित किया गया है। पूरे घर को अपनी चंचलता से गुंजायमान करने वाली अंगू की माँ सांप्रदायिक सद्भाव से संपृक्त है। लेखिका ने लिखा है- “अपनी जाति का लेबल लगाये गर्वीली अंगू की माँ अछूतों के यहाँ भी सस्नेह निमंत्रित की जाती है।….यदि सवर्णो में शादी-ब्याह की ढोल अंगू की माँ की चौडी़ हथेली का आघात सह कर चिल्लाती है तो हरिजनों का ढोल भी उन्हीं थापो से दहाड़ता है।” अतः जीवन के विविध उतार-चढ़ाव के विरुद्ध वह अपने हँसमुख अंदाज और चंचलता के बल पर टकराती है ।
दसवीं कहानी ‘आइना’ की प्रधान पात्र ‘रीटा’ है। वह एक पढ़ी-लिखी,दफ्तर में काम करने वाली युवती है । वह आइना देखने से बचती है, मानो किसी प्रकार का फोबिया हो उसे आइने से । कहानी के उत्तरार्द्ध हिस्से को पढ़ने पर यह पता चलता है कि वह दरअसल किसी फोबिया की शिकार नहीं बल्कि एक जीवनदर्शन की अनुगामिनी है । उसे हर पल यह महसूस होता है कि आइने में दिखने वाली स्त्री वह नहीं जिसे वो पहले से जानती हो । अतः यह कहानी आत्मान्वेषण की एक दृष्टि है ,जो एक स्त्री के स्वरुप को उसके रंग-रूप से नही बल्कि उसके चरित्र से परखने की मांग करता है।
ग्यारवीं कहनी ‘सोलह साल की बेटी’ एक किशोरी के स्नेहपूर्ण अन्तस की महागाथा है। सुमित्रा की सोलह साल की बेटी काव्या अपने अपूर्ण प्रेम से शोकाहत अपने मन में तूफान तथा आँखों में समुन्द्र छिपाए रहती है। उसकी यह अवस्था सुमित्रा को अपने किशोरावस्था की याद दिलाती है कि किस प्रकार उसने सोमेश के पत्रों को अग्नि के हवाले किया था। वह स्मृति जब भी सुमित्रा के मन में आती है ,वह सिहर उठती है। यही वजह है कि जब उसकी पुत्री भी उसी दौर से गुजरती है तो उसे काव्या पर गुस्सा नहीं बल्कि तरस आता है। अतः कहानी में स्त्री जीवन के विवशता को दर्शाया गया है।

अंतिम तीन कहानियों (कहानी का प्लाट, कासे कहूँ और बारिश) में भी स्त्री के इन्ही विविध एहसासों की अभिव्यक्ति हुई है । डॉ. शुभ्रा उपाध्याय के समस्त कहानियों के स्त्री पात्र पुरुष के वर्चश्ववादी समाज से लड़ कर अपनी अस्मिता को सिद्ध करना नहीं चाहती बल्कि वे अपनी उपादेयता और निष्ठा के बल पर मानवीय संबंधों को नई दिशा देना चाहती हैं । उनकी कहानी की नायिकाएं उस सम्मान की अभिलाषी हैं जिससे उन्हें वंचित रखा गया है। वे प्रत्येक क्रियाकलाप पर प्रश्न चिह्न लगाना नहीं चाहती, उनकी आकांक्षा बस इतनी है कि उन्हें भी खुले आकाश में विचरण करने दिया जाय, उन्हें भी सपने देखने और उसे पूरा करने की आजादी दी जाय। डॉ. शुभ्रा उपाध्याय ने कहानियों के कथानक समकालीन समाज से ही लिया है। मनोविश्लेषणवादी दृष्टि से भी कृति का अनेक महत्व है। पाठक चाहे तो किरदार के मन-मस्तिष्क में चल रहे मानसिक अवगुंठनों को सरलता से समझ सकते हैं। लेखिका की भाषा बिल्कुल ही सहज, सरल एवं प्रवाहमयी है जिसमें संस्कृत से लेकर देशज शब्दों का प्रयोग किया गया है । उन्होंने अपने पात्रों के भाषा का निर्धारण भी मनोवैज्ञानिक धरातल पर किया है । समग्रतः भारतीय समाज में स्त्री चेतना तथा मानवीय संबंधों में रुचि रखने वाले पाठक को यह पुस्तक ‘अंतराल’ अवश्य पढ़नी चाहिए ।

स्त्रियों की अंतर्कथा : ‘अंतराल’

पुस्तक : अंतराल
लेखक : शुभ्रा उपाध्याय
प्रकाशक : मानव प्रकाशन
संस्करण : प्रथम संस्करण, 2010
पृष्ठ संख्या : 120
मूल्य : 200/-

(लेखक विद्यासागर विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं)

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