हो सकता है दो आदमी दो कुर्सियां” की समीक्षा

जयदेव दास
प्रशनिकी सम्प्रति महानगर कोलकाता की रंग संस्था पदातिक और रिक के संयुक्त तत्वाधान में प्रस्तुत नाटक ‘हो सकता है दो आदमी दो कुर्सियां” का प्रदर्शन पदातिक स्टूडियो में हुआ। जिसके लेखक/निर्देशक जानेमाने अभिनेता विनय शर्मा हैं। प्रस्तुति की शैली आडम्बर मुक्त अंतरंग रही। आदमी की निःसंगता, एकाकीपन को गहरे सन्नाटे में उभारती ये प्रस्तुति कई मायनो में रेखांकित करती है। छोटी छोटी घटनायें, शब्द-चित्रों का सहारा लेकर नाटक आगे बढ़ता है। जबकि प्रत्येक दृश्य का एक दूसरे से कोई सरोकार न होते हुए भी नितांत अंतरंगता लिए हुए है। अलग अलग दृश्य में अलग अलग किरदार अपनी आपबीती से रूबरू कराते हैं। हर दृश्य में अलग अलग रंग शैलियों का प्रभाव दिखता है। पहले ही दृश्य में दो आदमी दो कुर्सियों पर पास-पास बैठे हुए किसी चीज को देख रहे हैं। पर एक दूसरे के आचरण से परेशान होते रहते हैं। अवान्तर रंगमंच (एब्सर्ड थिएटर) का प्रभाव खासकर ‘वेटिंग फ़ॉर गोदो’ साफ झलकता है। प्रस्तुति के दौरान यूजेन अयनेस्को के बहुचर्चित अवान्तर नाटक ‘दी चियर्स’ की याद आने लगती है। साथ ही ज्यां पॉल सात्र के अस्तित्व वाद पर पुनः बहस की जरूरत महसूस होती रहती है। वरिस्ठ अभिनेता अशोक सिंह को अभिनय करते देखना एक अलग अनुभूति है। वहीं विनय शर्मा द्वारा दो दृश्य में किये गए अभिनय के कारण हिंदी रंगदर्शकों का एक अरसे से रसास्वादन की प्यास पूर्ण हो जाती है।
प्रशानिक : जयदेव दस (नाट्यस्नातक, दो दशक से अधिक समय से रंगमंच में नाट्यलेखक, निर्देशक, अभिनय द्वारा सक्रिय)
नोट : नाट्यशास्त्र के 27th अध्याय में रंग समीक्षक को प्रशानिक कहा गया है
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