3 राज्य यूँ ही नहीं गँवाये… भाजपा ने बड़ा जुआ खेला है

सुषमा कनुप्रिया
पाँच राज्यों के विधानसभा निपट गये। कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन किया, राहुल गाँधी एक अच्छे और परिपक्व नेता बनकर उभरे हैं। भाजपा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अहंकार को गहरी चोट लगी। यह भाजपा के लिए आत्ममंथन का समय है। भाजपा के लिए 2019 में सत्ता वापसी करना आसान नहीं होगा….इन दिनों तमाम अखबार और चैनल व वेबसाइट ऐसे विश्लेषणों से भरे पड़े हैं। निश्चित रूप से राहुल गाँधी एक अच्छे नेता बनकर उभरे हैं मगर कुछ सवाल ऐसे हैं, जिन पर अगर सोचा जाए तो मामला कुछ और ही निकलता है। विश्लेषण अपने – अपने होते हैं, सही या गलत हो सकते हैं मगर हर विश्लेषण और दृष्टि का अपना महत्व होता है।
इस जीत को सीधे -सपाट रूप से देखना बहुत सी बातों को अनदेखा करना हैं। मेरा यह मानना है कि भाजपा को इस समय जीत से ज्यादा हार की जरूरत थी। किसी भी आकलन से पहले आपको हमेशा याद रखना होगा कि भाजपा न तो क्षेत्रीय पार्टी हैं और न ही क्षेत्र तक सीमित रहना इसका लक्ष्य है। भाजपा एक राष्ट्रीय पार्टी है और इसके लिए यह राष्ट्रीय छवि अधिक मायने रखती है और इसके राजनीतिक लक्ष्य भी क्षेत्रीय से अधिक राष्ट्रीय ही हैं। जाहिर है कि इस राष्ट्रीय लक्ष्य यानि सीधे तौर पर 2019 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए इस पार्टी के लिए तीन राज्यों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण केन्द्र की सत्ता है। हमारी समझ में पार्टी ने सिर्फ जुआ ही नहीं खेला बल्कि ऐसा जाल बिछाया है जिसमें कांग्रेस ही नहीं बल्कि पूरा विपक्ष फँसता जा रहा है।


जवाबदेही और समस्याओं को सुलझाने की जिम्मेदारी अब कांग्रेस की
यह याद रखने की जरूरत है कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़, इन तीनों राज्यों में सत्ता सम्भालना तलवार की धार पर चलना है। जनता में धैर्य नहीं होता, वह अपनी समस्याओं का तुरन्त व त्वरित परिणाम चाहती है। मध्य प्रदेश में बेरोजगारी, अशिक्षा, विकास व किसान के मुद्दों के साथ व्यापम जैसे कांड भी हैं जिनकी आँच सीधे कांग्रेस तक भी जाती है। राजस्थान में सरकारी अस्पतालों से लेकर परिवहन क्षेत्र तक में लगातार हड़तालें हो रही हैं। 19 जिलों में पानी एक विकट समस्या है और चुनावी मौसम में यह और तेज होगी। ठीक यही बेरोजगारी, विकास, निकासी व किसान समस्या, छत्तीसगढ़ के मुद्दे हैं। कांग्रेस के क्षत्रपों के सामने इनको सुलझाना और तय समय में सुलझाना एक बड़ी समस्या होगी। कांग्रेस ने जिन चेहरों को लेकर विधानसभा चुनाव लड़ा, वह अब केन्द्र की राजनीति में चाहकर भी समय नहीं दे सकेंगे। कमलनाथ और अशोक गहलोत जैसे नेताओं ने जो बड़ा किरदार निभाया, वह लोकसभा में दिखे भी तो उतनी गहराई से नहीं दिखेगा। जनता की नाराजगी को मैनेज करने में कांग्रेस की बड़ी ऊर्जा जाने वाली है। आपने शिवराज सिंह का बयान सुना होगा…नाऊ आई एम फ्री, अब मैं आजाद हूँ। फिलहाल तो भाजपा के तीनों नेता आजाद हो गये।


राज्य सम्भालेंगे या गुटबाजी से निपटेंगे राहुल
आप गौर कीजिए कि भाजपा के तमाम दलबदलू मंत्रियों ने चुनाव के ठीक पहले ही भाजपा से किनारा किया है। राहुल गाँधी भले ही किसी एक को चुनें, दूसरे पक्ष को असन्तुष्ट होना ही है। जाहिर है कि भाजपा ऐसे असन्तुष्टों को साधने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। कांग्रेस के तमाम क्षत्रपों में भले कितने ही एकता दिखती हो मगर उनके जिन समर्थकों में सत्ता की लालसा है, उनका क्या होगा…? राजस्थान में तो कलह सत्ता सम्भालने के पहले ही दिखने लगा है। सीएम पद के लिए प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट और अशोक गहलोत दोनों की ओर से दावेदारी की जा रही है। प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते सचिन पायलट सीएम पद से नीचे समझौता करने के लिए तैयार नहीं हैं। पूर्व सीएम अशोक गहलोत तीसरी बार सीएम बनने के लिए मजबूत तरीके से दावेदारी पेश कर रहे हैं। जयपुर में विधायक दल की बैठक हुई। करीब आठ घंटे की मशक्कत का नतीजा सिफर रहा। डीग-कुम्हेर से एमएलए विश्वेंद्र सिंह विधायक दल की बैठक बीच में छोड़कर चले गए। उन्होंने कहा कि जब फैसला आलाकमान को करना है तो यह बैठक क्यों? यही स्थिति भाजपा की होती और यही असन्तोष पार्टी को देखना पड़ता और यह लोकसभा की तैयारियों के लिए अच्छी खबर नहीं होती। राहुल गाँधी अपनी सरकारों के वायदे पूरे करें या गुटबाजी दूर करें, मगर उनका ध्यान अब अपनी सरकारों पर ही अधिक रहेगा क्योंकि अब कांग्रेस को सत्ता के साथ जवाबदेही भी मिली है। जाहिर है कि भाजपा इस स्थिति से बचकर अपने नेताओं को एकजुट करना चाहती थी, तो अब तमाशा देखने की बारी भाजपा की है। कांग्रेस के मौन असन्तुष्टों पर पार्टी की नजर बनी हुई है।


वसुन्धरा को पहाड़ के नीचे लाने के लिए राजस्थान गँवाना जरूरी था
वसुन्धरा राजे सिन्धिया ने ऐसे काम किये जो पार्टी को पसन्द नहीं थे। उनकी मनमानी के कारण राज्य में तीन – चार माह तक कोई प्रदेश अध्यक्ष ही नहीं बन पाया। यहाँ तक कि टिकटों के बँटवारे में भी वसुन्धरा की ही चली। वसुन्धरा ने किसी की नहीं सुनी और यह बात भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को खली जरूर होगी मगर उनके पास तब कोई रास्ता नहीं था। राजस्‍थान की जनता और पार्टी के कई नेता मुख्‍यमंत्री वसुंधरा राजे स‍िंध‍िया की कार्यशैली से असंतुष्‍ट थे। केन्द्रीय नेतृत्‍व को भी इसकी श‍िकायतें लगातार म‍िलती रही थीं। कार्यकर्ताओं की शिकायत थी कि वसुन्धरा राजे किसी की सुनती नहीं हैं। उनके और कार्यकर्ताओं के बीच खाई गहरी होती गयी। राजस्‍थान में संगठन के कार्यकताओं और नेतृत्‍व के बीच तालमेल बिठाने के लिए अमित शाह ने प‍िछले साल अगस्‍त में संघ के प्रचारक रहे चंद्रशेखर को संगठन महामंत्री बनाकर भेजा था। अगर राजस्थान में भाजपा जीतती तो इसका मतलब था कि अमित शाह के लिए वसुन्धरा को रोक पाना नामुमकिन हो जाता और इसका दुष्प्रभाव सीधे लोकसभा चुनावों पर पड़ता। वसुन्धरा राजे जनता की नाराजगी को समझने में नाकाम रहीं और सरकार के 30 में से 20 मंत्री हार गए। इनमें से दो ने अपने बेटे को टिकट दिलाया था और बेटे भी नहीं जीत पाए लेकिन सरकार के 30 में से मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे समेत महज 7 मंत्री जीते। चुनाव हारने के बाद वसुन्धरा के सुर भी नरम पड़े हैं और अरसे बाद उन्होंने पीएम पर राष्ट्रीय अध्यक्ष को याद किया। अब सम्भव है कि वे पार्टी नेतृत्व की सुनें। मतलब सीधा है, राजस्थान में पार्टी को अनुशासित करना और फैसले ले पाना अमित शाह के लिए आसान होगा।
बागियों को अब गम्भीरता से लेगी पार्टी
भाजपा के लिए यह आत्ममन्थन का ही नहीं बल्कि पार्टी से जा चुके लोगों को वापस लाने का समय है। राजस्थान में भाजपा ने चार मंत्रियों को टिकट काटा था और वह बागी बन के मैदान में उतरे थे यह चारों बागी मंत्री चुनाव हार गए। अब हो सकता है कि उनको गम्भीरता से लिया जाए और सम्भव है कि सुलह भी हो जाए। अन्य राज्यों के बारे में भी यही कहा जा सकता। लोकसभा चुनाव में अभी 4 महीने का वक्त है…सियासत बदल भी सकती है।


अब लोकसभा की तैयारियों के लिए भाजपा के पास सेनापति अधिक होंगे
भाजपा के तीनों मुख्यमंत्रियों ने हार की जिम्मेदारी खुद ली है। जाहिर है कि वे अब अपनी छवि सँवारने के लिए कड़ी मेहनत के मूड में हैं। इसका सीधा फायदा लोकसभा चुनावों में मिल सकता है। गौर करने वाली बात यह है कि सीटें भले ही कांग्रेस को अधिक मिली हों मगर वोट प्रतिशत में अन्तर इतना अधिक भी नहीं है कि उसे भरा न जा सके। वसुन्धरा, शिवराज और रमन सिंह, अब जमीनी स्तर पर काम करने पर ध्यान देंगे और अन्तर भरना चाहेंगे। सुषमा स्वराज और उमा भारती ने पहले ही चुनाव न लड़ने की घोषणा कर दी है तो पार्टी उनका उपयोग प्रचार के लिए कर सकती है। इसके साथ ही सम्भव है कि पार्टी बड़बोलों पर अंकुश लगाये व कई बड़ी घोषणायें करे। दूसरी ओर कांग्रेस के सेनापति अब व्यस्त हो चले हैं तो वे राहुल भी उनका विकल्प तलाशेंगे मगर इसमें समय लगेगा।


विपक्षी एकता में हल्की सी दरार पड़ी तो है
जब तक कांग्रेस कमजोर थी, राहुल गाँधी को प्रधानपत्री पद का चेहरा बनाने पर वह समझौता करने पर तैयार हो सकता था, अब ऐसा नहीं होगा। सभी दलों के लिए राहुल को स्वीकार कर लेना इतना आसान भी नहीं है। अगर पार्टी नेतृत्व तैयार भी हो तो जमीनी स्तर पर इसका लाभ मिले, यह जरूरी नहीं है। विपक्ष की सबसे बड़ी समस्या है कि इसके पास इतने चेहरे हैं कि वह किसी एक चेहरे का चयन नहीं कर पा रहा है। तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी केन्द्र की सत्ता के लिए सोनिया से हाथ मिलाती हैं तो राज्य में कांग्रेस समर्थकों को पिटवाती भी हैं। अगर माकपा व कांग्रेस हाथ मिला लें तो जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता नाराज होंगे। ममता के लिए राहुल का नेतृत्व स्वीकारना अब भी आसान नहीं होगा। वह अपनी अनिच्छा जाहिर कर भी चुकी हैं। कांग्रेस की जीत से वह बहुत ज्यादा खुश इसलिए नहीं हैं क्योंकि अब कांग्रेस उनके सामने मुकाबला करने के लिए तैयार है जबकि कांग्रेस हार जाती तो ममता को आसानी होती। बहरहाल, ममता के ये इरादे पूरे नहीं हुए मगर सांसद उनके पास पूरे हैं और बंगाल में वह सीटों को लेकर समझौता करें, इसके आसार अब भी कम हैं। समझौता हो जाए तो तृणमूल कांग्रेस को जितवाएगी, यह मान लेना भी खुद को धोखे में रखना है। शायद यही कारण है कि कांग्रेस ने बंगाल में अकेले लड़ने का फैसला किया है। हाथ मिलाने से दिल नहीं मिला करते। प्रदेश कांग्रेस की गुजारिश पर केन्द्र में कांग्रेस ने बंगाल से अकेले लड़ने का निर्णय ले लिया है। मायावती ने मजबूरन कांग्रेस को समर्थन देना तय किया है मगर वह लोकसभा में भी यही करेंगी, कहना जल्दबाजी होगी। हर पार्टी के अपने हित हैं, इन हितों को एक साथ साधना आसान नहीं है। चन्द्रबाबू नायडू को कांग्रेस के साथ रहकर लाभ नहीं हुआ है। वहीं अगर भाजपा जीतती तो सभी दल एक हो जाते और विपक्ष एक बार फिर मजबूत हो जाता मगर अब कांग्रेस का पलड़ा भारी है और कई दल उसके साथ हैं मगर इसके बावजूद विपक्ष की एकता भारी रहेगी, कहा नहीं जा सकता।


भाजपा अब सहयोगियों को साथ लाएगी
अब तक फर्क नहीं पड़ा था मगर लोकसभा चुनाव आते ही रणनीति बदलेगी। केसीआर को प्रधानमंत्री मोदी खुद पसन्द करते हैं और एनडीए उनको मनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। भाजपा ने क्षेत्रीय पार्टियों की ताकत देखी हैं और अब वह अपने बागी उम्मीदवारों के साथ सहयोगियों को साथ लाने की पूरी कोशिश करेगी। त्रिपुरा, मणिपुर जैसे उत्तर – पूर्वी राज्यों के अतिरिक्त अब अन्य राज्यों में नये सहयोगियों की तलाश शुरू कर सकती है।
कहने का मतलब यह है कि इन दूरगामी परिणामों को देखा जाए तो तीन राज्यों को हार जाना कोई महँगा सौदा नहीं है। बड़ी जंग जीतने के लिए छोटी लड़ाइयाँ कई बार हारनी पड़ती हैं और मोदी-शाह की नजर बड़ी जंग पर है…वैसे…पिक्चर अभी शुरू हुई है…आगे -आगे देखिए…क्या होता है…तब तक इन्तजार।

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