497 का खत्म होना अपराधी नहीं बनाता मगर बेवफाई का लाइसेंस भी नहीं

गुजरे माह का अंतिम सप्ताह गहमागहमी से भरा रहा। कई फैसले सुप्रीम कोर्ट में ने दिए और कुछ ऐसे फैसले भी दिए जिससे परम्परागत भारतीय समाज हिल गया है। धारा 377 के झटके से अभी लोग उबरे नहीं थे कि धारा 497 को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में स्त्री को सम्पत्ति मानने से इनकार कर दिया मतलब अवैध कहे जाने वाले यानि अडल्टरी के मामले में औरतों को सजा के दायरे में लाने से इनकार कर दिया और अब लोग सीधे इसे शादी, परिवार और समाज की सोच पर हमला करने वाला फैसला बता रहे हैं। देखा जाए तो औरतों को इस कानून के निरस्त हो जाने का लाभ मिलेगा, ऐसा दिखता तो नहीं है बल्कि अडल्टरी के जिस सेफ्टी वॉल्व के हथियार से अब तक वे रिश्ते और परिवार को बचाती आ रही थीं, वह भी टूट जायेगा।
अगर हम यह कहें कि अवैध सम्बन्ध नहीं होते तो यह गलत है, होते हैं मगर समाज और बच्चों के दबाव में एक छत के नीचे अजनबी की तरह रहते हुए भी तमाम उपेक्षाओं के बावजूद जीवन काट लेती हैं। पुरुष मजबूरन आवरण रखता है, छोड़कर जाता है फिर बुढ़ापे में लौट आता है या कई बार दोनों रिश्ते एक साथ निभाकर प्रतिष्ठा के साथ रहता है। 3 -4 पत्नियों की स्वीकृति समाज में है मगर जब बात महिलाओं की आती है तो यह बात गले नहीं उतारी जाती। महिलाओं के ऐसे रिश्ते भी या तो उच्च वर्ग में होते हैं या निम्न मध्यम वर्ग में और यहाँ पर भी ढके – छिपे रहते हैं। कला के क्षेत्र में तो किसी तीसरे का होना प्रेरणा की तरह होता है जिसे सब जानते हैं मगर स्वीकार कर लेते हैं।
पत्नियों को यह भरोसा होता है कि अन्ततः उनका पति उनका ही है इसलिए भी वे खामोशी साध लेती हैं, ये जानते हुए भी उनका पति कई लड़कियों की जिन्दगी बर्बाद कर रहा है, उनको कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उनका घर और परिवार सुरक्षित है। वे लड़कियों से लड़ बैठती हैं मगर अपने पति के खिलाफ जुबान नहीं हिलातीं क्योंकि उनका घर सुरक्षित है, उनका दर्जा सुरक्षित है, वे आर्थिक और सामाजिक रूप से सुरक्षित हैं। कारण यह है कि उच्च वर्ग में ऐसा हुआ तो पत्नियों के नाम अच्छी – खासी सम्पत्ति लिख देते हैं और प्राथमिकता भी अपने बच्चों और परिवार को ही देते हैं मगर वफादारी निभाने के चक्कर में शोषित होती है वह दूसरी औरत और अन्ततः उसे कहीं जगह नहीं मिलती। कभी अन्या से अनन्या पढ़ें तो आपको इस दोहरेपन का वीभत्स चित्रण मिलेगा। अवैध कहे जाने वाले सम्बन्धों को लेकर लिखा खूब गया है। फिल्में भी बनी हैं मगर भारतीय समाज ने उनको स्वीकार नहीं किया। यश चोपड़ा की सिलसिला से लेकर करण जौहर की कभी अलविदा न कहना बुरी तरह पिटी मगर समय बदल रहा है। अच्छा अब कल्पना कीजिए, अगर कानून निरस्त न होता और आपकी इच्छा के अनुसार महिलाओं को भी सजा दी जाने लगती तो क्या आप उनको जीने देते? क्या आप यह दावा कर सकते हैं कि आप उनको हदें नहीं बतातें। अभी भी तो अधिकतर ऐसे मामलों में पत्नी की हत्या करना ही तो आम बात है न, ऐसे में तो यही कहा जा सकता है कि यह एक विरोधाभासी फैसला है मगर आपके रवैये ने इसे न्यायसंगत बना दिया है।
औरतों को औरतों के रूप में देखिए न इन्सान की तरह, अपनी तरह, ये देवी बनाकर अपनी जिम्मेदारियों से पीछा छुड़ाने का कोई मतलब है। कोर्ट ने बस इतना ही कहा है कि औरतें भी आपकी तरह ही इन्सान हैं, सम्पत्ति नहीं जिसके आप मालिक बने बैठे हैं।
सवाल तो एक छोटा सा ही है कि क्या जिस देश को रिश्तों और परम्पराओं के लिए जाना जाता रहा है, वहाँ यह डोर क्या इतनी कमजोर थी कि एक कानून खत्म होने से रिश्ते भी टूट जायेंगे? क्या नैतिकता की यह डोर इतनी कमजोर है, अगर हाँ तो इसे टूट ही जाने दीजिए? दरअसल, आप डरे इसलिए हैं क्योंकि आप शादियाँ ही कई बार इमोशनल ब्लैकमेलिंग करके करवाते रहे हैं कि शादी के बाद सब ठीक हो जाएगा। आपने अपनी शान और इज्जत के नाम पर बेटों की जिन्दगी से प्यार छीना तो बेटियों की पढ़ाई छुड़वाकर दूर ब्याहा तो आपका डरना तो स्वाभाविक है। जिस समाज में रिश्तों को भय और घुटन के बीच ढोया जा रहा है, वहाँ तो कुछ न कुछ टूटेगा और आपको डर है कि अब आपराधिक मामले में फँसा भी नहीं सकते तो आप तो दूसरा तरीका भी आजमाते हैं…सीधे मार डालते हैं। ऑनर किलिंग को लेकर सुप्रीम कोर्ट कितनी बार आपको टोक चुका है, आप बदले? नहीं बदले तो एक 497 के न रहने से क्या फर्क पड़ेगा। आप प्यार छीनकर किसी को भावुकता के जाल में फँसाकर उसे दूसरी जगह अपने स्टेटस के हिसाब से बाँध सकते हैं, प्यार नहीं बना सकते हैं, समझौता करना सिखा सकते हैं। आपने यही किया है सदियों से और इसलिए आप तो डरेंगे ही। भारत में 80 प्रतिशत अडल्टरी के किस्से ऐसे ही खत्म हो जाएंगे अगर अविवाहित लड़कियों या लड़कों को घुमाना भी इसका आधार माना जाए और पति या पत्नी इसे लेकर ईमानदारी से सख्ती बरतें। हमारे देश में बेवफाई का किस्सा भी अजीब होता है या यूँ कहें कि उसकी परिभाषा भी बड़े अजीब तरीके से होती है। अगर बात न्याय की करनी है तो ईमानदारी के साथ विवाहित ही नहीं अविवाहित लड़कियों या लड़कों को घुमाना भी अपराध के दायरे में लाइए…दूसरी औरत या दूसरे पुरुष की जगह एक नजर खुद पर और अपने आदर्श जीवनसाथी पर भी डालिए और हर फैसला ईमानदारी से लीजिए….फिर किसी सेफ्टी वॉल्व की जरूरत नहीं पड़ेगी जैसे अब 497 की नहीं है। यह अपराध का नहीं रहा मगर तलाक का आधार तो अब भी है।  497 का खत्म होना आपको अपराधी नहीं बनाता मगर यह बेवफाई का लाइसेंस भी नहीं है।

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