पत्रकारों का सूरत ए हाल,,,,कल भी बेहाल, आज भी बदहाल

सुषमा कनुप्रिया
अब 15 साल हो रहे हैं और जब मैं पत्रकारिता में आयी थी तो लड़कियाँ न के बराबर थीं। हालाँकि यह स्थिति अँग्रेजी और बांग्ला के अखबारों के साथ नहीं थी। पत्रकारों की परिभाषा में ही इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों का दबदबा था। लोग हमारे हाथों में कलम नहीं बल्कि कैमरे और बूम तलाशा करते थे। हमसे अक्सर पूछा जाने वाला पहला सवाल ही होता कि हम किस चैनल से जुड़े हैं और जैसे ही मैं बताती कि मैं चैनल में नहीं बल्कि अखबार में काम करती थी तो सबके चेहरे लटक जाया करते थे। पत्रकार, वह भी महिला पत्रकार और वह भी हिन्दी अखबार की पत्रकार…स्थिति तो विचित्र ही थी। तब महिलाओं की उपस्थिति को सहजता से नहीं लिया जाता था मगर स्थिति तो सबके लिए ही एक जैसी थी मगर मेरे लिए समस्या दोहरे स्तर पर थी। वैसे ही जैसे हिन्दी मीडिया में काम कर रही अन्य लड़कियों के लिए होती थी मगर अब स्वीकृति बढ़ जाने से स्थिति थोड़ी बेहतर हुई थी।
मुझे याद है कि जब मैंने अपने दोस्तों और परिचितों को बताया था कि मुझे अखबार में नौकरी मिली है तो मुझे सावधान और सजग करने वाले लोग अधिक थे। उनका मानना था कि मीडिया में अच्छे लोग काम नहीं करते और लड़कियाँ तो बिलकुल नहीं क्योंकि पत्रकारों का सामना हर तरह के लोगों से होता है। मैं तब बहुत दब्बू टाइप हुआ करती थी क्योंकि पत्रकारिता में आने के पहले मेरी मंजिल कॉलेज से घर ही थी। हमारे घर में खासकर मेरे घर में लड़कियों के नौकरी करने की परम्परा नहीं थी और शिक्षण को आदर्श कार्य माना जाता था क्योंकि वहाँ सुरक्षा और तय ढर्रा था मगर मैंने जो क्षेत्र चुना या यूँ कहूँ कि जिस क्षेत्र ने मुझे चुना, वहाँ समय की तो सीमा ही नहीं थी। 2004 के बाद कोलकाता के हिन्दी मीडिया संस्थानों में महिलाओं की उपस्थिति बढ़ी।

कुछ बड़े संस्थानों को छोड़ दें तो अधिकतर छोटे अखबार एक या दो दड़बेनुमा कमरों में चलते थे, आज भी चलते हैं। मीडिया संस्थानों को तब भी महिलाओं को निर्णायक पदों पर देखने में ऐतराज था, आज भी है। महिला पत्रकारों का अधिकतर समय संशय में गुजरता है और उनका अधिकतर डेजिग्नेशन अधिकतर मामलों में वरिष्ठ संवाददाता तक सीमित रहता है। जो संस्थान महिलाओं को कथित तौर पर प्रमुखता देते रहे हैं, वहाँ भी सुविधाओं के नाम पर शोषण अधिक है। आप अपनी रीढ़ की हड्डी तोड़कर उनके हवाले कर दें तो चीफ रिपोर्टर क्या ब्यूरो चीफ भी बनाये जा सकते हैं और ऐसा करने वाले लोग हैं जिनमें लड़कियाँ भी शामिल हैं। जिनको पत्रकारिता का सही अर्थ तक नहीं पता और वह अपने आकाओं के लिए काम निकालने का माध्यम भर हैं। वे सम्पादकों के निजी व्यवसाय सहयोगियों में अपनी स्वेच्छा से तब्दील हो चुकी हैं मगर आज मान्यता और तथाकथित पदोन्नति की सीमा पार करने वाले लोग वहीं हैं और ऐसी लड़कियाँ हैं। सवाल यह है कि इससे पत्रकारिता का क्या भला हुआ और लड़कियाँ कहाँ तक मानसिक और वैचारिक स्वतन्त्रता प्राप्त कर सकी हैं? अगर ये आकलन करें तो आप सिर पीटने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सकते। मैंने आरम्भिक दिनों में पत्रकारिता की उड़ान देखी है तो स्याह अँधेरे भी देखे हैं। बड़े से बड़े पत्रकारों को चीफ रिपोर्टर से सम्पादक बने महानुभवों को थर – थर काँपते देखा है। इन सम्पादकों को अखबार के मालिकों के सामने हाथ जोड़ते, भागते और मातहतों पर हाथ उठाकर शेखी बघारते देखा है। सम्पादक साम, दाम, दंड भेद की नीति से पत्रकारों को लड़वाते, वरिष्ठ पत्रकारों की बेइज्जती कनिष्ठ पत्रकारों से करवाते देखा है। आज ऐसे सम्पादक सर्वेसर्वा हैं तो हिन्दी पत्रकारिता की उम्मीद ही खुद को धोखा देने की तरह है।
प्रगति के नाम पर 2 दर्जन से अधिक मीडियाकर्मियों को इसी शहर में रातों – रात बाहर का रास्ता दिखाया गया मगर एक भी आवाज नहीं उठी। उनका कसूर सिर्फ इतना था कि उनकी उम्र हो चुकी है तो सवाल यह है कि हमारी नीतियों में क्या वरिष्ठ नागरिकों के लिए जगह सिर्फ कागजों पर है? आपने पूरी व्यवस्था को बदलने के लिए उन तमाम लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया जो आपके संस्थान की नींव की ईंट थे। आपने उनको प्रशिक्षण क्यों नहीं दिलवाया? क्या सीखना वरिष्ठों के अधिकार क्षेत्र में नहीं है। सवाल यह है कि कितने मीडिया संस्थान पत्रकारों की कार्य कुशलता बढ़ाने के लिए किसी कार्यशाला अथवा सेमिनार आयोजित करते हैं…इस शहर के हिन्दी मीडिया संस्थानों में तो एक भी नहीं है। मैंने एक घटना तो यहाँ तक सुनी कि एक पूर्व कर्मी ने जब संस्थान में जाना चाहा तो उसे धक्के मारकर निकलवाया। कुछ स्वनामधन्य अखबारों ने तो पूर्व सम्पादकों के सन्दूक भी खुलवाकर देखे हैं…ऐसा मैं नहीं कहती। जगजाहिर कहानी है और पत्रकारिता के उत्कर्ष की बातें करते हैं तो यह क्या विडम्बना नहीं है?
जिलों की खबरें आती हैं, गलतियों से भरपूर होती हैं और जब उनसे मैंने ध्यान देने को कहा तो पता चला कि इन स्ट्रिंगरों को नाम मात्र की राशि मिलती है तो उनका दो -टूक उत्तर भी होता है कि जितना मिलेगा, उसी के हिसाब से काम करेंगे। आपने पत्रकारों को बुनियादी सुविधायें तक नहीं दीं तो आप उनसे उम्मीद ही नहीं कर सकते कि वह कुछ बेहतर और खोजपरक खबरें करें। जिला संवाददाताओं की स्थिति तो और भी खराब है। नाममात्र के पैसे और वह भी जब समय पर न मिलें तो उसके पास दूसरा विकल्प तलाशने के सिवाय कोई रास्ता नहीं बचता। ऐसे पत्रकार ही दूसरे व्यवसाय भी करते हैं और दलाली तथा फिरौती भी। आप उनको कुछ कह नहीं सकते हैं क्योंकि आपने उनको समुचित सुविधायें नहीं दी हैं।
पत्रकारिता में सम्पादक आज सर्वेसर्वा नहीं है। विज्ञापन के अनुकूल नीतियाँ बनानी पड़ती हैं। पत्रकार होना संवाददाता, सब एडिटर भर नहीं है बल्कि परदे के पीछे आपके संस्थान को चमकाने के लिए जो लोग काम कर रहे हैं, वह भी आपकी दुनिया और पत्रकारिता का हिस्सा हैं। । मान्यता सिर्फ संवाददाताओं को मिलती है जो कि अधिक से अधिक 60 प्रतिशत हो भी तो मान्यता प्राप्त पत्रकार अधिकतम प्रतिशत 30 प्रतिशत भर हैं तो फिर ये जो 70 प्रतिशत हिस्सा है,..उनके हिस्से क्या आया। इनमें गैर मान्यता प्राप्त संवाददाता, सब एडिटरछायाचित्रकार, पेजीनेटर, वीडियो एडिटर, सर्कुलेशन से लेकर विज्ञापन तक के लोग शामिल हैं..ये सब हाशिये पर क्यों हैं…?
पत्रकारों से मारपीट, बदसलूकी व हत्या
सरकार केन्द्र की हो या राज्य की, उसका उद्देश्य पत्रकारों से काम निकालना होता है और इसके बाद पक्ष हो या विपक्ष, हर जगह मीडिया को पीटा जाता है। बंगाल में ऐसी न जाने कितनी घटनाएं हो चुकी हैं। त्रिपुरा के एक निजी चैनल में काम करने वाले पत्रकार शांतनु भौमिक की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट’ के शोध के अनुसार देश में साल 1992 से अब तक 91 पत्रकारों को मौत के घाट उतारा जा चुका है। विडंबना यह है कि सिर्फ 4 प्रतिशत मामलों में ही इंसाफ मिला। 96 प्रतिशत मामलों में अपराधियों को किया गया माफ 96 प्रतिशत मामलों में अपराधियों को माफी मिल गई। 23 मामलों में हत्या के पीछे छिपा मंसूबा नहीं पता चला। सिर्फ 38 मामलों में मोटिव स्पष्ट हो पाया। जिनकी मौत का कारण स्पष्ट हुआ उनमें कई को इंसाफ नहीं मिला। कुछ को मिला तो आधा अधूरा। सबसे ज्यादा हत्या राजनीतिक कारणों से हुई हत्या सबसे ज्यादा 47 प्रतिशत पत्रकारों की मौत राजनीति क्षेत्रों को कवर करने के दौरान हुई है। उसे बाद भ्रष्टाचार को उजागर करने वाल 37 प्रतिशत पत्रकारों को मौत के घाट उतार दिया गया। 21 प्रतिशत अपराध, 21 प्रतिशत बिजनेस व 21 प्रतिशत संस्कृति संबंधित क्षेत्रों को कवर करने वाले पत्रकारों को निशाना बनाया गया। वहीं मानवाधिकार को लेकर 18 प्रतिशत पत्रकारों की मौते हुईं। आपको बता दें कि जिन पत्रकारों की हत्या हुई वह एक साथ दो तीन क्षेत्रों को देखते थे, इसलिए आंकड़ा 100 प्रतिशत से ऊपर है। महिलाओं को तो यौन उत्पीड़न से गुजरना पड़ता है और बड़ी -बड़ी हस्तियाँ भी ऐसा करने में पीछे नहीं हैं।


प्रिंट पत्रकारों को सबसे ज्यादा बनाया गया निशाना
लगभग 88 प्रतिशत पत्रकारों ऐसे पत्रकारों को निशान बनाया गया जो प्रिंट मीडिया में काम करते थे। 12 प्रतिशत टीवी पत्रकारों की हत्या की गाई। वहीं 8 प्रतिशत रेडियो व इंटरनेट पत्रकारिता करने वालों का निशाना बनाया गया। हत्या का शक राजनीतिक दलों पर सबसे ज्यादा पत्रकारों की हत्या के बाद जांच में पाया गया कि 36 फीसदी पत्रकारों कि हत्या में राजनीतिक दलों के हाथ होने की आशंका जताई गई। 28 फीसदी हत्याओं में किसी आपराधिक समूह पर शक किया गया। स्थानीय लोगों के शामिल होने की आशंका 12 फीसदी हत्याओं में हुई। वहीं 12 फीसदी हत्याओं में किसी सरकारी अधिकारी व पैरामिलिट्री पर शक किया गया। पत्रकारों की हत्या के मामले में भारत दुनिया में 14वें स्थान पर पूरी दुनिया में ऐसे कई देश है जहां पर पत्रकारों की मौत के बाद उन्हें इंसाफ नहीं मिला। भारत ऐसे देशों की सूची में 14वीं स्थान पर है। इन देशों की सूची में सबसे ऊपर सोमानिया और इराक है। इसके अलावा पाक, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, श्रीलंका जैसे देश भी शामिल है। इन सभी देशों के 83 फीसदी मामले अब भी अनसुलझे हें 96 फीसदी मामलों में स्थानीय पत्रकारों को निशाना बनाया गया था। प्रत्येक दस में से चार पत्रकारों को बंदी बनाया गया या पहले धमकियां मिली थी। (सन्दर्भ – साभार समाचार फॉर मीडिया)

शांतनु भौमिक को भी मार डाला गया

भारत में क्षेत्रीय भाषाओं में रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार सबसे ज़्यादा ख़तरे की ज़द में रहते हैं क्योंकि वे कम चर्चित होते हैं। साल 2017 में बेंगलुरु में एक पत्रकार गौरी लंकेश को उनके घर के बाहर ही गोली मार दी गई। इसी तरह त्रिपुरा में एक क्राइम रिपोर्टर सुदीप दत्ता भौमिक की हत्या कर दी गई थी. इसके बाद कई अख़बारों ने इसके विरोध में अपने संपादकीय हिस्से को खाली छोड़ दिया था। कितनी सरकारें, संस्थाएं और लोगों मीडिया को बचाने के लिए सड़क पर उतरे, यह एक सवाल है क्योंकि चौथा खम्भा बचेगा ही नहीं तो बाकी तीन खम्भों की हिफाजत कैसे होगी?
इतिहास भी अधूरा और उपेक्षित
हिन्दी पत्रकारिता की दुनिया का इतिहास दरअसल सम्पादकों और उनके अखबारों का इतिहास है। सवाय है कि क्या युगल किशोर सुकुल ने अकेले अखबार निकाला होगा जो कि सम्भव ही नहीं है तो बाकी लोग कहाँ गये? कृष्ण बिहारी मिश्र की पुस्तक सम्पादकों पर बात करती है, संवाददाताओं, छायाकारों, पृष्ठ सज्जाकारों और प्रिटिंग के इतिहास पर खास खोज नहीं हुई। हिन्दी का पहला अखबार जहाँ निकला, आज आमड़तल्ला गली में वह मकान गुम है। बहुत से पत्रकार गरीबी में मरे और आज भी जी रहे हैं। पहला पेजिनेटर, पहली महिला पत्रकार, छायाकार, सब मौन हैं। क्या मीडिया संस्थानों में इन पर शोध नहीं होना चाहिए?
दुनिया में पत्रकारों की स्वतन्त्रता हाशिये पर
वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में इरिट्रिया सबसे निचली पायदान पर है। तानाशाही शासन वाले इस पूर्व अफ्रीकी देश के खस्ताहाल की खबरें बाहर नहीं निकलतीं। कई पत्रकारों को मजबूरन देश छोड़ना पड़ा है। इरिट्रिया के बारे में निष्पक्ष जानकारी पाने के लिए पेरिस से चलने वाले रेडियो एरीना को एकलौता स्रोत माना जाता है।
तानाशाह के इशारे पर – पूरी दुनिया की नजर से छिपे हुए उत्तरी कोरिया में भी प्रेस की आजादी नहीं पाई जाती। शासक किम जोंग उन की मशीनरी मीडिया में प्रकाशित सामग्री पर पैनी नजर रखती है। लोगों को केवल सरकारी टीवी और रेडियो चैनल मिलते हैं और जो लोग अपनी राय जाहिर करने की कोशिश करते हैं, उन्हें अक्सर राजनैतिक कैदी बना दिया जाता है।
तुर्कमेनिस्तान पर नजर – केवल एक अखबार है और इस अखबार के संपादकीय भी छपने से पहले जांचे जाते हैं। हाल ही में आए एक नए कानून से लोगों को कुछ विदेशी मीडिया संस्थानों की खबरें तक पहुंच मिली है। इंटरनेट और तमाम वेबसाइटों पर सरकार की नजर होती है।
आलोचकों का सफाया – विएतनाम में स्वतंत्र पत्रकारिता का कोई अस्तित्व ही नहीं है. सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी पत्रकारों को बताती हैं कि क्या प्रकाशित होगा। (भारतीय वामपंथी गौर से जरूर पढ़ें जो कि भारत में लोकतंत्र की दुहाई देते हैं)। कई मीडिया संस्थानों के पत्रकार, संपादक, प्रकाशिक खुद ही पार्टी के सदस्य हैं। अब ब्लॉगरों पर भी कड़ी नजर रखी जा रही है। पार्टी के विरुद्ध लिखने पर जेल में डाल दिया जाता है.।
चीन में नहीं आजादी – रिपोर्ट्स विदाउट बॉर्डर्स का कहना है कि चीन दुनिया में पत्रकारों और ब्लॉगरों के लिए सबसे बड़ी जेल है। किसी भी न्यूज कवरेज के पसंद ना आने पर शासन संबंधित पक्ष के विरुद्ध कड़े कदम उठाता है। विदेशी पत्रकारों पर भी भारी दबाव है और कई बार उन्हें इंटरव्यू देने वाले चीनी लोगों को भी जेल में बंद कर दिया जाता है।
सीरिया में सुलगते हालात — सीरिया में अब तक ऐसे कई पत्रकारों को मौत की सजा दी जा चुकी है, जो असद शासन के खिलाफ हुई बगावत के समय सक्रिय थे। रिपोर्ट्स विदाउट बॉर्डर्स ने सीरिया को कई सालों से प्रेस की आजादी का शत्रु घोषित किया हुआ है। वहां असद शासन के खिलाफ संघर्ष करने वाला अल-नुसरा फ्रंट और आईएस ने बदले की कार्रवाई में सीरिया के सरकारी मीडिया संस्थान के रिपोर्टरों पर हमले किए और कईयों को सार्वजनिक रूप से मौत के घाट उतारा।

चित्र साभार

भारत भी पीछे – इस देश में आपातकाल लग चुका है तो सेंशरशिप का कोपभाजन अखबारों को भी बनना पड़ा था। आए दिन हत्यायें आम बात हैं। लोकतांत्रिक और बहुजातीय देश होने के बावजूद भारत प्रेस फ्रीडम की सूची में शामिल 180 देशों में 136वें नंबर पर है. उसके आस पास के देशों में होंडुरास, वेनेज्वेला और चाड जैसे देश हैं।

बात अब मजीठिया पर
उच्चतम न्यायालय ने पत्रकारों और गैर-पत्रकारों के वेतन पुनर्निर्धारण के लिए गठित मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों को शुक्रवार को बरकरार रखते हुए कर्मचारियों को परिवर्तित वेतन देने का निर्देश दिया। प्रधान न्यायाधीश पी. सदाशिवम की अध्यक्षता वाली 3 सदस्यीय खंडपीठ ने कहा कि कर्मचारियों को परिवर्तित वेतन 11 नवंबर, 2001 से मिलना चाहिए। सरकार ने इसी तारीख को बोर्ड की सिफारिशें अधिसूचित की थीं। न्यायालय ने कहा कि कर्मचारियों को नया वेतन अप्रैल, 2014 से मिलेगा और नियोक्ता को 1 साल के भीतर 4 किस्तों में बकाया राशि का भुगतान करना होगा। न्यायाधीशों ने कहा कि हम सिफारिशों को वैध ठहराते हैं। न्यायाधीशों ने कहा कि बोर्ड ने अपनी सिफारिशें देने के लिए उचित प्रक्रिया का पालन किया था और उसके तथा उसके गठन के बारे में लगाए गए आरोप सही नहीं हैं। न्यायालय ने बोर्ड के गठन की वैधानिकता और इसकी सिफारिशों को चुनौती देने वाली विभिन्न समाचार-पत्रों के प्रबंधकों की याचिकाएं खारिज कर दीं। न्यायालय ने कहा कि अतिरिक्त वेतन (वेरिएबल पे) के बारे में बोर्ड की सिफारिशें भी उसके अधिकार क्षेत्र में थीं। न्यायालय ने कहा कि यह नहीं कहा जा सकता कि वेतन संरचना अनुचित है। न्यायालय ने इस साल जनवरी में समाचार-पत्रों की याचिकाओं पर सुनवाई पूरी करने के बाद कहा था कि निर्णय बाद में सुनाया जाएगा। श्रम मंत्रालय ने समाचार पत्र उद्योग की आपत्तियों के बावजूद 2007 में मजीठिया वेतन बोर्ड का गठन किया था और इसके बाद जनवरी, 2008 से कर्मचारियों को मूल वेतन का 30 फीसदी तदर्थता के आधार पर अंतरिम राहत देने की घोषणा की गई थी। भारी वित्तीय बोझ के बावजूद समाचार-पत्र उद्योग ने इसे लागू किया था। वेतन बोर्ड ने 31 दिसंबर, 2010 को अपनी सिफारिशें सरकार को सौंपी थीं जिन्हें केंद्र ने कुछ संशोधनों के साथ 11 नवंबर, 2011 को अधिसूचित किया था। ये खबर तमाम बड़े अखबारों और मीडिया संस्थानों ने दबायी और समाचार कहीं नहीं दिखा। मान्यता प्राप्त या गैर मान्यता प्राप्त, सब पत्रकारों की स्थिति एक ही है….मनाइए पत्रकारिता दिवस….।
(सन्दर्भ – साभार समाचार फॉर मीडिया, डी डब्ल्यू, वेबदुनिया)

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