मनुष्य और उसकी संभावनाओं के कवि हैं प्रियंकर पालीवाल” – प्रो0 अरुण होता

कोलकाता :  बंगीय हिंदी परिषद् की ओर से हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि, आलोचक और संस्कृति चिंतक प्रियंकर पालीवाल की कविता पुस्तक “वृष्टि-छाया प्रदेश का कवि” पर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया।परिचर्चा गिष्ठी की अध्यक्षता करते हुए हिंदी के सुप्रसिद्ध आलोचक प्रो0 अरुण होता ने कहा कि यह कविता संग्रह प्रियंकर जी के पिछले 53-54 सालों की सबसे समृद्ध कमाई है। लगभग 34 साल पहले उन्होंने कविता-लेखन को गंभीर रूप से देखना शुरू किया था और इतने दिनों में 53 कविताओं का जो संग्रह हिंदी जगत को सौंपा है, वह बताता है कि कितने धैर्य के साथ, बिना किसी हड़बड़ी के कवि ने कैसे अपने समाज, संस्कृति , परम्परा और वर्तमान को समझने की कोशिश की है।यथार्थ के चित्रण में कवि की जो व्यापक भविष्य दृष्टि समाहित है वह सबसे खराब दौर से गुजर रहे मनुष्य में भी संभावनाओं की खिड़की खोल देती है। वे धैर्य और स्थैर्य के कवि हैं। विद्यासागर कॉलेज के विभागाध्यक्ष डॉ आशुतोष ने कहा कि प्रियंकर पालीवाल के व्यक्तित्व में जो धैर्य, गंभीरता,सरलता और शालीनता है उसे उनकी कविताओं में भी देखा जा सकता है।शहर और गाँव दोनों की विसंगतियों, सौंदर्य, परंपरा और संस्कृति को जितनी बारीकी से कवि ने चित्रित किया है वही कवि को विशिष्ट बनाती हैं। परंपरा और हमारा सांस्कृतिक इतिहास उनके लिए बड़े महत्व के हैं परंतु वे कहीं भी कवि के पैर की बेड़ी नहीं बनने पाए हैं। युवा आलोचक डॉ मृत्युंजय पांडेय ने कहा कि पालीवाल जी संभावनाओं से अधिक यथार्थ के कवि हैं। उनके अंदर एक गाँव बसता है, उसकी परम्परा और संस्कृति इनकी काव्य ऊर्जा और शक्ति के रूप में प्रतिबिंबित होते हैं। पालीवाल जी गम्भीरता पूर्वक पढ़े जाने की माँग करते हैं। उन्हें हल्के ढंग से नहीं पढ़ा जा सकता है। यथार्थ के साथ -साथ वे उम्मीद यकीन और भरोसे के कवि हैं। युवा साहित्य चिंतक पीयूषकांत राय ने कहा कि ‘वृष्टि-छाया प्रदेश का कवि’ संकलन की कविताएँ शिल्प और भाषा की दृष्टि से इतनी सुगठित हैं कि एक भी शब्द को आप हिला नहीं सकते।किसी भी शब्द को अगर उसके स्थान से हटा दिया जाय तो कविता का सौंदर्य नष्ट हो जाएगा।किसी भी कवि में यह क्षमता वर्षों की काव्य-यात्रा के पश्चात ही आ पाती है। पिछले 34 सालों की इनकी काव्य यात्रा को इस रूप में देखना चाहिए।कवि के अचार और विचार में जो निकटता है वही युवा पीढ़ी को उनके नजदीक ले जाता है।आज के युग में नयी पीढ़ी को सत्य और मूल्य से जोड़ने में तमाम बड़े आचार्य इसलिए विफल हैं क्योंकि उनका अचार तुच्छ है। उनके विचार बड़े हैं किन्तु अचार बौने हैं।हमें गर्व है कि हमारे शहर में एक ऐसा कवि है जिसके अचार और विचार में दूरी नहीं है और वही सत्य इनकी कविताओं की सबसे बड़ी शक्ति है।वे हमारे शहर के बौद्धिक संपदा हैं। गोष्ठी में स्वयं कवि ने अपनी रचना प्रक्रिया के अनुभवों को साझा किया और अपने आत्म-संघर्ष से साक्षात्कार कराते हुए कहा मेरी कविताएँ समय समय पर अपने समय के साथ की गईं मुठभेड़ हैं, वे मेरी आत्म-समीक्षा का परिणाम हैं।कविता मेरे लिए जीवन को समझने का उपक्रम है।मैं खुद को एक सचेत नागरिक – कवि के रूप में देखता हूँ। मंच के संचालक युवा आलोचक डॉ कुमार संकल्प ने कहा कि प्रियंकर पालीवाल जी की कविताएँ अपने समय और उसकी दिशा पर गहरे सोच-विचार की माँग करती हैं।उन्हें पढ़ते हुए आप अपने युग की हलचलों को पढ़ सकते हैं और तमाम तरह के संकटों से लड़ने का नैतिक सामर्थ्य जुटा सकते हैं। दाम्पत्य प्रेम की कविताओं की दृष्टि से वे केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन की परंपरा के कवि हैं । निराला ने पुत्री पर कविता लिखी थी ‘सरोज-स्मृति’।हिंदी साहित्य में बहन पर गिनी चुनी ही कविताएँ लिखीं गयीं हैं । कवि के इस संग्रह से यह शिकायत हिंदी जगत को नहीं रह जाएगी। धन्यवाद ज्ञापन करते हुए परिषद् की अध्यक्ष और कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज की प्राचार्या (प्रिंसिपल) प्रो0 सत्या उपाध्याय ने कहा कि प्रियंकर पालीवाल की कविताएँ हिंदी जगत को समृद्ध करती हैं। इसमें राजस्थान की धड़कन के साथ – साथ हिंदी प्रदेश का स्पंदन है।परिचर्चा में परिषद् के उपाध्यक्ष डॉ सत्यप्रकाश तिवारी, सदीनामा के संपादक जितेंद्र जितांशु, प्रसिद्ध कहानी लेखक कुशेश्वरजी, सेराज खान बातिश, प्रो0 शुभ्रा उपाध्याय,शहर के प्रसिद्ध ग़ज़लकार ज्ञान प्रकाश पांडेय,श्रीमोहन तिवारी, अनिल उपाध्याय,सर्वेश राय,कवि रमाकांत सिन्हा, कवि रामनारायण झा,स्कॉटिश चर्च कॉलेज के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ बीरेंद्र सिंह,उमेश पांडेय,आनंद प्रकाशन के नीलू त्रिपाठी,प्रेसिडेंसी विवि से गोपाल, अनूप, अंजली, शनि,बंगबासी कॉलेज से प्रियंका, सुलेखा,ज्योति,श्रीकांत,साहिल,कोलकाता विवि से राजकुमार गुप्ता ,डॉ कमल आदि ने भाग लिया।

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