मुज्जफरपुर कांड : सिर्फ शोर मत बचाइए, जमीन पर जाकर काम भी कीजिए

आपने राक्षस देखे हैं….और राक्षसों के आगे घुटने टेकते राजा देखे हैं…..? आपने कलियों को असमय जमीन पर टूटते और कुचले जाते देखा है….पहला वाकया याद करने के लिए आपको पुराणों में झाँकने की जरूरत नहीं है…आपको किसी रामायण और महाभारत को देखने की जरूरत भी नहीं है….हमारा समय इतना बेरहम समय है कि आपको अब रावण और कंस की बुराई करने की जरूरत भी नहीं है क्योंकि वह राक्षस हमारे और आपके पास ही हैं….अगर आपने सोशल मीडिया पर पिछले कुछ दिनों से बिहार के मुज्जफरपुर कांड की तस्वीरें देखीं तो वहाँ पर बृजेश ठाकुर के चेहरे पर तैरती खौफनाक हँसी को देखिए….राक्षस शायद इससे भी नर्मदिल ही होंगे। हैरत की बात यह है कि इस मुद्दे पर सीएम नीतीश कुमार भी खामोश हैं। राजनीति की बात छोड़िए…राजनेता तो पहले से ही बदनाम हैं। उनके कर्तव्य वे कितने निभाते हैं….सबको पता है मगर इससे क्या हमारी जिम्मेदारी कम होती है। कलियाँ मसली जातीं रहीं, टूटती रहीं और हम तमाशा देखते रहे..जनाब…वह इस देश की तकदीर थी जो तोड़ी जा रही थी।

इतने लम्बे समय से आस – पास के लोगों का खामोश रहना….ये क्या दर्शाता है? इससे भी शर्मनाक यह कि इसमें भी औरतें शामिल हैं…आखिर क्यों नहीं मंत्री को तब तक बर्खास्त किया जाता, जब तक उनके पति बेदाग न निकलें…ऐसी कौन सी मजबूरी है? एक आदमी 300 प्रतियाँ अखबार की छापकर किस तरह लाखों के विज्ञापन पा लेता है और स्वयंसेवी संस्थाओं पर निगरानी करने के लिए कोई आयोग क्यों नहीं है और अगर है तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या बृजेश के करीबी पत्रकार भी कुछ नहीं जानते थे और अब पत्रकार खबरों से इतर कोई कदम क्यों नहीं उठा रहे हैं? क्या गारण्टी है कि भविष्य में किसी और राज्य से इस तरह के कृत्य सामने नहीं आयेंगे। बिहार में जुवेनाइल कोर्ट के लिए भी अदालतों को क्यों कहना पड़ रहा है? बिहार के साहित्यकार…बुद्धिजीवी क्या कर रहे हैं… चिन्ता मुज्जफरपुर के लिए नहीं है….देश भर में फैले ऐसे होम्स के लिए है…क्या आपको नहीं लगता कि निगरानी में चूक हुई?

इस कांड को लेकर बिहार की छवि निश्चित रूप से खराब हुई है तो ऐसे में आप बिहार को ब्रांड कैसे बनाने जा रहे हैं, नीतीश बाबू? आज तेजस्वी तंज कस रहे हैं तो क्या यह खेल उनके जमाने से नहीं चला आ रहा था मगर सब के सब ब्लेम गेम खेलने में व्यस्त हैं…जब कुछ हो जाता है, तभी बुद्धिजीवी या साहित्यकार क्यों उतरते हैं…यह मेरी समझ के बाहर है। अचानक बिहारी होने पर उनको शर्म आने लगती है…मगर क्या यह उनकी जिम्मेदारी नहीं है कि जमीनी स्तर पर जाकर ऐसे इलाकों में काम करें? जरूरी है कि त्वरित अदालतों के साथ जुवैनाइल कोर्ट भी हों…शेल्टर होम्स पूरी तरह संस्थाओं के भरोसे न छोड़े जायें और सभी दोषियों पर सख्त से सख्त कार्रवाई ही न हो बल्कि बच्चियों के पुनर्वास की व्यवस्था भी की जाए…वरना ऐसे कांड होते रहेंगे और आप रैलियों के सिवा कुछ नहीं कर सकेंगे। सिर्फ शोर मत बचाइए, जमीन पर जाकर काम भी कीजिए

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