वाराणसी का वह घर, जहाँ रहे देश के पूर्व प्रधानमंत्री शास्त्री जी

घर की रसोई में मिट्टी का चूल्हा हो और बेडरूम में पटुआ की सुतली से बिनी खाट तो एक बार आंखों पर यकीन नहीं होगा कि यह जगह देश के प्रधानमंत्री रहे लाल बहादुर शास्त्री की है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि अब मंत्री-विधायक तो दूर सत्ताधारी नेताओं के करीबी रिश्तेदार और कारिंदे भी मौका पाकर चंद दिनों में ही ऊंची हवेलियों के मालिक और कंगाल से करोड़पति बन बैठते हैं। पांच साल तक प्रधानमंत्री रहे शास्त्री जी का घर आज भी पुराना वाराणसी के रामनगर में उस दौर की स्वच्छ और ईमानदार राजनीति की गवाही दे रहा है।

संस्कृति मंत्रालय ने देश के दूसरे प्रधानमंत्री के मिट्टी के घर को म्यूजियम के रूप में तब्दील कर दिया है। बीते हफ्ते मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और राज्यपाल राम नाइक ने इसका उद्घाटन किया था। जय जवान, जय किसान का नारा देने वाले पूर्व प्रधानमंत्री के पैतृक आवास पर तैयार स्मृति भवन उनके जीवन का परिचय देगा। संग्रहालय के पहले कमरे में तैयार वॉर रूम में चीन और पाकिस्तान के युद्ध की दुर्लभ तस्वीरें लगाई गई हैं। शास्त्रीजी के रसोईघर और बैठक को भी उसी समय का लुक दिया गया है।

इसमें दो अक्टूबर 1904 को पूर्व पीएम के जन्म से लेकर 12 जनवरी 1966 को नई दिल्ली में विजय घाट पर अंत्येष्टि तक के बारे में जानकारी दी गई है। पूर्व पीएम की स्मृतियों से जुड़े 150 से अधिक चित्र लगाए गए हैं। काशी के लाल शास्त्री जी की दो अक्टूबर को 14वीं जयंती है। तो आइए, आज जानते हैं सादगी कर्मठता और आदर्श राजनीति के उस चेहरे के बारे में, जो इस दौर की सियासत के लिए सीख भी है और आइना भी।

शास्त्री जी! अब तो अपना मकान बनवा लीजिए

शास्त्री जी के घर की पिछले साल की तस्वीर – फोटो : अमर उजाला
काशी नरेश के किले से महज डेढ़ सौ मीटर के फासले पर घुमावदार गली के दूसरे मोड़ पर महज सवा विस्वा जमीन पर पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के कमरे में अभी वह लालटेन सहेज कर रखी गई है, जिसकी रोशनी में उन्होंने पढ़ाई की थी। तीन चूल्हे भी उन दिनों के संघर्ष की आंच दबाए वहीं गड़े हैं, जहां उनकी मां राम दुलारी देवी बेटे के लिए उम्मीदों की भाप में खुद तपा करती थीं। पड़ोस में रहने वाले शास्त्री जी के फुफेरे भाई श्याम मोहन उन दिनों के उनके संघर्ष और सत्ता शीर्ष पर पहुंचने के बाद की ईमानदारी को याद कर भावुक हो उठे। आंखें भर आईं। 1965 के उस दिन की यादों में खो गए जिस रोज पीएम के रूप में शास्त्री जी घर आए थे। वो बताते हैं कि तब उनकी उम्र 14 साल की थी। दोपहर का वक्त था। सुबह से ही पुलिस का पहरा रामनगर में लग गया था। भैया की कार के आगे पीछे दर्जनों गाड़ियां थीं। चौक पर काफिला रुका और भैया अंगरक्षकों को रोक कर सीधे सबसे पहले किले में काशीनरेश डॉ. विभूति नारायण सिंह से मिलने पहुंचे। वहां से पैदल ही गली से होकर घर आए थे। उनके चाचा काली प्रसाद और किशोरी लाल ने दरवाजे पर अगवानी की थी। घर आते ही उन्होंने सत्यनारायण भगवान की कथा सुनी।

पंडित जी प्रसाद देने बढ़े तो जांच के लिए सुरक्षा कर्मियों ने लपक लिया। भैया मुस्कुराते हुए बोले- यह मेरा घर है यहां चिंता की कोई बात नहीं। उन्होंने प्रसाद माथे लगा लिया था। उस दिन भैया को देखने के लिए समूचा रामनगर ही नहीं, बनारस और मिर्जापुर से लेकर मुगलसराय तक उमड़ पड़ा था। भैया ने अंगरक्षकों को दूर खड़ा करा दिया। सबका हाल पूछते मिलते-जुलते रहे। तभी पड़ोस के राजनारायण लाल मुलाकात के लिए आ गए। बोले- शास्त्री जी! अब तो अपना मकान बनवा लीजिए। उन्होंने जो जवाब दिया उसे सुनकर वो सहम गए। शास्त्री जी का कहना था कि मेरा तो अभी बहुत अच्छा है। मेरे देश की बहुतायत जनता के पास तो झोपड़ियां ही हैं। चिंता है कि पहले उनके मकान बन जाएं फिर अपने मकान के बारे में सोचूंगा। उस दिन भैया ढाई घंटे घर में रहे। फिर कभी नहीं आ सके। 11 जनवरी 1969 को हम लोग हिल गए, जब उनके हमेशा के लिए इस दुनिया से चले जाने की खबर आई।
 शास्त्री संग्रहालय में आधुनिक तकनीक और पुरातन का संगम
पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री स्मृति भवन संग्रहालय में कुल 14 कमरे हैं। इन कमरों में आधुनिक तकनीक और पुरातन का संगम दिखाया गया है। उनका जीवन परिचय महत्वपूर्ण तिथियों के साथ एक कमरे में लगाया गया है। इसमें दो अक्टूबर 1904 को पूर्व पीएम के जन्म से लेकर 12 जनवरी 1966 को नई दिल्ली में विजय घाट पर अंत्येष्टि तक के बारे में जानकारी दी गई है। पूर्व पीएम की स्मृतियों से जुड़ी 150 से अधिक चित्र लगाए गए हैं। एक कमरे में उनके पिता शारदा प्रसाद और माता रामदुलारी देवी का ब्लैक एंड व्हाइट फोटो लगाई गई है। इसमें पूर्व पीएम के वंश वृक्ष का जिक्र किया गया है। एक कमरे में खटिया पर सफेद चादर और तकिया, बल्ब जलता हुआ लालटेन, बेना रखा गया है, जिसमें पूर्व पीएम विश्राम करते थे। इसी कमरे में छत पर जाने के लिए सीढ़ी बनाई गई है। एक कमरे में उनका बैठका था। जहां बैठकर बातचीत करते थे। उनके भाषण और कहे वाक्य को स्लोगन बनाकर लगाया गया है। ललिता शास्त्री की प्रतिमा के पास जवान और किसान को दिखाया गया है।
रसोई घर में सिल बट्टा, ओखली, मूसर, पत्थर की चक्की, चौका, बेलन, मिट्टी का चूल्हा, केतली, मथनी, गिलास, लोटा, थाली, पानी भरने का पीतल का गगरा सहित आदि सामान रखे गए हैं। खटिया, मचिया सहित कई जरूरी सामान रखे हैं। दो कमरों के बीच में आंगननुमा जगह पर जय जवान और जय किसान के नारे बंदूक और हल के जरिए दिखा गया है।

स्मृति भवन में लाल की स्वाभिमानी ललिता की कहानी

स्मृति भवन में लाल की स्वाभिमानी ललिता की कहानी दर्शाई गई है। बच्चों के आग्रह पर पूर्व पीएम ने बतौर प्रधानमंत्री एक फिएट बैंक लोन से खरीदा था। किस्तों की अदायगी के पूर्व वे गोलोकवासी हो गए। बैंक अधिकारियों ने ललिता शास्त्री से किस्त माफ करने का आग्रह किया लेकिन उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया। भारत के लाल की ललिता ने सच्ची अर्धांगिनी के रूप में न केवल लौकिक जीवन में उनका ख्याल रखा बल्कि पारलौकिक जीवन में शास्त्री जी के स्वाभिमानी आत्मा पर आंच नहीं आने दी। अपने पारिवारिक पेंशन से कार के बची किस्तों का भुगतान किया।
(साभार – अमर उजाला)
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