सोनम वांगचुक सैनिकों के लिए बना रहे मिट्टी के टेंट, ठंड में खुद से होंगे गर्म

इंजीनियर, खोजी और शिक्षा व्यवस्था में कई सारे काम करने वाले सोनम भारतीय सेना के जवानों को सर्दी से बचाने के लिए काम कर रहे हैं। कश्मीर के लेह और लद्दाख इलाके में काफी ठंड रहती है। सैनिकों को सीमा के पास बंकर बनाने और उन्हें सर्दी से बचाने पर काफी पैसे खर्च करने पड़ते हैं। सोनम ने मिट्टी की सहायता से कुछ ऐसे प्री-फैब्रिकेटिड सोलर हीटेड टेंट बनाने के बारे में सोचा जिसमें सैनिकों को ठंड न लगे। सोनम ने अपने प्रॉजेक्ट का प्रोटोटाइप भी तैयार कर लिया है।
सोनम वांगचुक को तो आप जानते ही होंगे। वही, जिनसे प्रेरणा लेकर 3 इडियट फिल्म बनाई गई थी और आमिर खान का किरदार उनसे काफी हद तक प्रभावित था। इंजीनियर, खोजी और शिक्षा व्यवस्था में कई सारे काम करने वाले सोनम ने भारतीय सेना के जवानों को सर्दी से बचाने के लिए काम कर रहे हैं। कश्मीर के लेह और लद्दाख इलाके में काफी ठंड रहती है। सैनिकों को सीमा के पास बंकर बनाने और उन्हें सर्दी से बचाने पर काफी पैसे खर्च करने पड़ते हैं। फिर भी सैनिकों को पूरी तरह से सर्दी से राहत नहीं मिलती। सोनम वांगचुक ने एक प्रॉजेक्ट पर काम करना शुरू किया था, जिसे अब भारतीय सेना की फंडिंग मिल रही है।

इकनॉमिक टाइम्स की खबर के मुताबिक सोनम ने मिट्टी की सहायता से कुछ ऐसे प्री-फैब्रिकेटिड सोलर हीटेड टेंट बनाने के बारे में सोचा जिसमें सैनिकों को ठंडी न लगे। सोनम ने अपने प्रॉजेक्ट का प्रोटोटाइप भी तैयार कर लिया है। अगर उनका यह मिशन सफल हुआ तो इस क्षेत्र में लगभग 10,000 टेंट बनाने होंगे। इन्हें बनाने के लिए लद्दाख में फैक्ट्री स्थापित की जाएगी और इससे वहां के लोगों को रोजगार भी मिलेगा।

लेह-लद्दाख क्षेत्र समुद्र तल से 12,000 फीट की ऊंचाई पर पड़ता है। जहां अत्यधिक ठंड पड़ती है। सर्दियों में यहां का तापमान माइनस बीस डिग्री तक पहुंच जाता है। मार्च अप्रैल में भी यहां माइनस पांच तापमान रहता है। लद्दाख क्षेत्र नेशनल पावर ग्रिड से भी नहीं जुड़ा है इसलिए बिजली की सप्लाई छोटे हाइड्रो पावर प्रॉजेक्ट से होती है। इतनी बिजली यहां के लिए नाकाफी होती है। गर्मी पाने के लिए यहां के लोग मिट्टी का तेल या लकड़ियां जलाते हैं। जो कि खर्चीला होने के साथ ही पर्यावरण के लिए भी हानिकारक है।

जम्मू कश्मीर सरकार के स्टेट स्किल डिपार्टमेंट मिशन के एक समारोह के दौरान वांगचुक ने बताया कि ये सोलर पैसिव स्ट्रक्चर होंगे। यह कोई नई बात नहीं है। नई बात यह है कि इन्हें एक से दूसरी जगह ले जाया जा सकेगा और ये प्री-फैब्रिकेटिड होंगे। इन्हें जरूरत की जगह पर तेजी से असेंबल किया जा सकेगा। इससे आर्मी की शेल्टर से जुड़ी समस्या का हल निकलेगा।

इनकी हीटिंग में कोई खर्च नहीं होगा। माइनस 20 डिग्री तापमान में भी बिना किसी हीट सोर्स के इनके भीतर तापमान 20 डिग्री पर चला जाएगा। वांगचुक ने कहा कि ठंडी जगहों पर बिल्डिंग कॉस्ट 15 साल की हीटिंग के बराबर होती है। उन्होंने कहा कि सेना जवानों को गर्म रखने के लिए कितना तेल जलाती है और इससे कितना प्रदूषण होता है। यह स्थिति बदलने जा रही है। उन्होंने बताया, ‘हम कई प्रोटोटाइप्स पर काम कर रहे हैं। मुझे नहीं पता कि सेना की क्या नीति है, लेकिन उन्होंने इसमें रुचि दिखाई है और उन्होंने प्रोटोटाइप के लिए भुगतान भई किया है।’ सेना वांगचुक के हर प्रोटोटाइप का खर्च उठा रही है।

सोनम ने लद्दाख में माउंटेन विश्वविद्यालय बनाने की घोषणा भी की है। अगर उनका प्रोटोटाइप को हरी झंडी मिलेगी तो वे अपनी यूनिवर्सिटी में ही टेंट बनाने की फैक्ट्री लगाएंगे और बच्चों को लाइव उदाहरण देकर सिखाएंगे। उनका कहना है कि बच्चों को वास्तविक जिंदगी के अनुभवों से सिखाना चाहिए। उनकी यूनिवर्सिटी में बच्चों को ऐसे ही पढ़ाया जाएगा। वांगचुक ने अपनी यूनिवर्सिटी बनाने के लिए पैसे जुटाने का अभियान भी शुरू कर दिया है। उन्हें उनके आईस-स्तूप के लिए रोलैक्स अवॉर्ड मिला। इस अवॉर्ड के तहत उन्हें एक करोड़ रुपये भी मिले। उन्होंने बताया कि कई कॉर्पोरेट फर्म से संपर्क करने पर उन्होंने 1.5 करोड़ रुपये इकट्ठा कर लिए हैं।

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