हर साल पत्नी को रिक्शा में बैठा 45 सौ किलोमीटर पैदल चल कर पहुँचते हैं वैष्णो देवी के दरबार

भोपाल : वैष्णोदेवी के मंदिर में लोग मुरादें पाते हैं.. रोते रोते आते हैं, हंसते हंसते जाते हैं..बात आज से 15 साल पहले की है। मध्यप्रदेश के अनूपपुर में रहने वाले यादव दंपती संतोष और प्रेमा संतान सुख से वंचित थे। संतान होती, पर जीवित न बचती। दुख और निराशा का घोर अंधकार घेरे चला था। उम्मीद की अंतिम किरण के रूप में यदि कुछ शेष था तो वह थी आस्था। मन में संतान की मुराद लिए दोनों माता वैष्णोदेवी के दरबार को चल पड़े..। सन्तोष कुमार यादव भले ही साधारण रिक्शा चालक हैं, लेकिन उनकी आस्था और संकल्प शक्ति असाधारण है। दरअसल, आस्था एक मनोविज्ञान है। आस्था की शक्ति अपना काम करती है, हम इसे चमत्कार कहते है। संतोष पिछले तेरह साल से हर शारदेय नवरात्र पर 4500 किलोमीटर (पैदल जाना और आना) का पैदल सफर तय कर माँ वैष्णोदेवी के दरबार तक पहुंचते हैं। देवी को धन्यवाद अर्पित करते हैं, श्रद्धासुमन भेंट करते हैं। यही नहीं वे अपनी पत्नी को रिक्शे में बैठाकर उसे भी देवी के दरबार तक खींच ले जाते हैं।
साठ साल से ऊपर का कमजोर हो चला शरीर, बढ़ी हुई सफेद दाढ़ी, लेकिन चेहरे पर आस्था, श्रद्धा और विश्र्वास की दृढ़ चमक। बताते हैं कि शादी के बाद संतान सुख से वंचित थे। पत्नी प्रेमा बाई की गोद सूनी बनी हुई थी। दो बार वह गर्भवती हुईं, लेकिन दोनों बच्चे जन्म के साथ ही गुजर गए। तब किसी के कहने पर माता वैष्णोदेवी के दरबार में झोली फैलाने का मन बनाया। देवी में पूर्ण आस्था रखते हुए यात्रा का संकल्प लिया। मन्नत रखी कि जन्म लेने वाला बच्चा जीवित बच जाएगा तो उसके 14 साल का होने तक हर साल मां वैष्णोदेवी के दर तक पैदल पहुंचेंगे।
इसके बाद प्रेमा पुन: गर्भवती हुईं। जब गर्भ छह माह का हुआ तो पति-पत्नी व्याकुल हो उठे। डर था कि कहीं यह बच्चा भी दामन से न निकल जाए। वैष्णोदेवी की शरण में जाने का निर्णय कर लिया। गर्भवती प्रेमा को अपने रिक्शे में बिठाकर सन्तोष निकल पड़े अनूपपुर से लगभग बाईस सौ किमी दूर आस्था के दर की ओर। तीन महीने लगे वैष्णोदेवी तक पहुंचने में। माता के दरबार के निकट पहुंच चुके थे। पर्वत पर चढ़ाई शुरू कर दी थी। प्रेमा बाई के गर्भ में पल रहा बच्चा इस दौरान नौ माह से ज्यादा का हो चुका था। प्रेमा बताती हैं, हम जैसे-तैसे माता के दरबार के निकट जा पहुंच थे। अब दर्शन ही शेष थे। थोड़ी ही चढ़ाई बची थी। मंदिर सामने था, लेकिन इससे पहले कि हम माता के दर्शन कर पाते मुझे प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। मैंने बालक को जन्म दिया। बाद में बच्चे को गोद में लेकर माता के दर्शन किए। बेटे को माँ का प्रसाद समझकर उसका नाम विष्णु प्रसाद रखा। माता ने कृपा की और आज विष्णु हमारे साथ है। हमारा सहारा है।
सन्तोष ने बताया कि आज तक यात्रा के दौरान कभी कोई असुविधा नहीं हुई। पूरे रास्ते लोगों का सहयोग मिला। रिक्श में जरूरी साजोसामान भी लाद लेते हैं। सोलर पैनल, पंखा, लाउड स्पीकर, खाने-पीने का समान, रिक्शा रिपेयरिंग के टूल और दवाई साथ रखते हैं।

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